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Abhijeet Dipke, Neha Bora की प्रेस कांफ्रेंस में Republic Channel का हंगामा।
@Saurabh_Unmute
A cold-blooded murder—and a chilling decision to appoint as Governor a man whom the victim’s family has named as prime suspect.
Was this appointment intended to shield him from criminal proceedings under Article 361(2) and arrest through court process under Article 361(3)? Is constitutional protection being used to obstruct accountability in the Ankita Bhandari murder case?
पिछले कई बरसों में दिल्ली की सड़कों पर ये सबसे बड़ा प्रोटेस्ट माना जा रहा है।
इस प्रोटेस्ट ने समूचे विपक्ष को जहां नया हौंसला दिया है वहीं पहली बार आम जनता बहुत बड़े पैमाने पर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरी है।
सुप्रीम कोर्ट में रंगे हाथ धरे जाने के बाद ज्ञानेश कुमार अब दोहरे जाल में फंस गये हैं।
एक तरफ अदालत में उनका झूठ पकड़ा गया है और दूसरी तरफ 215 करोड़ रूपये की फाईल खुल गई है।
केरल पुलिस की विजीलेंस शाखा के चीफ मनोज अब्राहम के पास पुख्ता सबूत हैं। फाईल पर पैसों की बात है। बिल को लेकर विवाद बताये जाते हैं। सुनिये केरल के गृहमंत्री रमेश चेन्निथला को ।
अब देखना है कि ज्ञानेश बाबू इस्तीफा देते हैं या अभी भी उन्हे सरकार बचाती है।
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#BREAKING Senior journalist #AjitAnjum (@ajitanjum) moves #SupremeCourt seeking to intervene in the pending 7-judge Reference on Legislative Privileges
His application highlights wider constitutional issues involved in the Reference, such as the relationship between legislative privilege, the public’s right to information, freedom of press and the extent to which courts may examine questions concerning legislative privilege.
बहनजी का बड़ा खुलासा।
बीजेपी ने चंद्रशेखर आजाद को यूपी की नगीना सीट से बेईमानी करके जितवाया।
बहनजी का कहना है EVM से छेड़छाड़ की गई थी जिसका फायदा आजाद को मिला।आजाद बीजेपी की बी टीम है और इनको उभारने का उद्देश्य बीएसपी को कमजोर करना है।मतलब दलित राजनीति में फूट डाली जा रही है।
Gyanesh must Go ! विपक्ष की बात छोड़िए—अब तो चुनाव आयोग के भीतर ही घमासान है।दोनों चुनाव आयुक्तों ने साफ कह दिया है कि ज्ञानेश कुमार के निर्देश पर ही करोड़ों नाम वोटर लिस्ट से काटे गये है और SIR प्रक्रिया अवैध और गैरकानूनी है।
ज्ञानेश कुमार अब पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं और उनके सामने इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नही है।
जो नंदीग्राम में हो रहा है इस वक्त , ऐसा 80 बरसों में नहीं हुआ।
पहले ममता की पार्टी तोड़ी गई, फिर बैंक खाते और चुनाव-चिह्न फ्रीज़ किए गए। फिर ममता की उम्मीदवार को मुख्यमंत्री की धमकी मिली और नामांकन वापस हो गया।
फिर मजबूर होकर ममता ने कांग्रेस को समर्थन दिया-तो कांग्रेस उम्मीदवार ही गिरफ्तार कर लिया गया!
बंगाल में सिस्टम ने सारी सीमाएँ लांघ दीं। सवाल है..क्या यह पाँच महीने बाद होने वाले उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के चुनावों का ट्रेलर है? देश को अभी से सचेत होना होगा।
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Buon compleanno al mio amico @narendramodi, a cui auguro salute, energia e successo.
Italia e India continuano a rafforzare il loro profondo legame di amicizia, costruendo insieme un futuro di cooperazione e prosperità per le nostre Nazioni.
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Super Exclusive-
योगी से सवाल की ऐसी सज़ा दी!
महिला पत्रकार रो पड़ी!!
प्रेस कॉन्फ्रेंस में योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछने वाली दिव्या श्रीवास्तव का इंटरव्यू।
सुनेंगे तो सिहर उठेंगे।
"मैने योगी आदित्यनाथ से एक सवाल पूछा था।
मुझे बीजेपी दफ्तर में घेर लिया। बहुत धमकाया।
कहा- बुलडोजर चलेगा घर पर।
LIU पीछे पड़ी है।
मुझे चैनल से भी निकाल दिया गया।
मैं अब कहीं नहीं हूं।
मैं बहुत डरी हुई हूं।"
The growing culture of abuse and counter-abuse on Twitter is deeply disturbing. People are constantly fighting, exaggerating and becoming aggressive merely to prove a point.
This behaviour does more than pollute the public discourse. It exposes people’s character before a wide audience, damages their credibility, disturbs their peace of mind and ultimately affects their health.
Always remember: whatever you write on social media becomes part of your public record. The public is watching, professional institutions are watching, and government agencies may also be watching.
If you are successful, talented or respected as an expert in your field, you have even more to lose. A moment of anger can undo years of carefully built credibility.
Disagree—but remain civil. Argue—but stay within limits. Your digital conduct is also a reflection of your personality.
Use Twitter thoughtfully. Protect your dignity, reputation and mental peace.
कुछ दिनों से सोशल मीडिया में जातीय संघर्ष को उभारा जा रहा है।
नतीजा सामने है। हापुड़ में बेहद मामूली से विवाद में दो पक्षों में झगड़ा इतना बढ़ा कि गोलियां चल गईं और एक दलित युवक की आज मौत हो गई।
सारा डिटेल लिखना नहीं चाहता क्योंकि माहौल और गर्म होगा।
आरोपियों की गिरफ्तारी हो गई है।लेकिन हापुड़ में माहौल अच्छा नहीं।
जरूरत है कि दोनों पक्षों के और समाज के बुजुर्ग आपस में बैठकर मामला शांत करें।ये हिंसा दोनों जातियों के टकराव का कारण न बने।
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ये वीडियो हैरान करने वाला है. दोनों लड़कियों के जिस्म पर पुलिसिया पिटाई के जख़्म हैं . इस बेरहमी के लिए दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए.
क्या मुख्यमंत्री से सवाल पूछना अब इतना बड़ा अपराध हो गया है कि पत्रकार को पुलिस बेरहमी से पीटेगी?
आज दिल्ली में 4PM की पत्रकार शाहीन के साथ जो हुआ, वह बेहद गंभीर और डराने वाला है.
शाहीन दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से सवाल पूछने की कोशिश कर रही थीं. शाहीन का आरोप है कि इसी दौरान दिल्ली पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और मारते-पीटते थाने ले गई. उनका यह भी आरोप है कि जब पुलिसकर्मियों ने उनका नाम पूछा और नाम में ‘खान’ सुना, तो उनके साथ मारपीट और बढ़ गई.
अगर एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए पीटा जाता है क्योंकि वह मुख्यमंत्री से सवाल पूछ रही है, तो यह मामला सिर्फ शाहीन या 4PM का नहीं है. यह देश की पूरी पत्रकारिता और प्रेस की आजादी का सवाल है.
पिछले दिनों 4PM ने दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से जुड़े मामलों पर लगातार गंभीर सवाल उठाए और खबरें प्रकाशित की थीं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आज की कार्रवाई का उन खबरों और सवालों से कोई संबंध है?
मुख्यमंत्री से सवाल पूछना अपराध कब से हो गया?
पत्रकार का सवाल सत्ता के लिए इतना खतरनाक कब से हो गया?
और किसी पत्रकार के नाम में ‘खान’ होना क्या उसके साथ मारपीट की वजह बन सकता है?
दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए.
हम मांग करते हैं कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो. घटनास्थल और थाने के CCTV सहित उपलब्ध सभी वीडियो फुटेज तत्काल सुरक्षित किए जाएं. यदि किसी पुलिसकर्मी ने शाहीन के साथ मारपीट या उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर दुर्व्यवहार किया है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो.
4PM सवाल पूछता रहा है और सवाल पूछता रहेगा.
पुलिस की ताकत से पत्रकार की आवाज दबाई नहीं जा सकती.
#Shaheen #PressFreedom #DelhiPolice #RekhaGupta #4PMNews #JournalismIsNotACrime
हाल देखिये भारत सरकार के इतने बड़े अफसर का जो कुछ महीने पहले रिटायर हुए।
आज सुबह जोशीजी को पुलिस ने हिरासत में लिया और घंटो पूछताछ की ।
जोशीजी का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होने कुछ पोस्ट किया था जो सरकार को अच्छा नहीं लगा।
उम्मीद है कि वो खुलकर इस तानाशाही पर खुलासा करेंगे।
A politician excites his supporters, a statesman restrains them. Statesmanship means defending people who may never vote for you and occasionally disappointing your own political base. On that test, most of the present day leaders seem to have fallen short.
Jaihind. Jai bharat.
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पेंगुइन इंडिया का सोनिया गांधी की आत्मकथा Belonging: A Journey of Love से पीछे हटना सामान्य घटना नहीं है। ये बताता है कि मौजूदा राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कितनी तरह की पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं और प्रकाशन उद्योग कितने दबाव में काम कर रहा है।
पेंगुइन के अमेरिकी प्रकाशक नॉफ ने घोषणा की थी कि पहली छपाई एक लाख प्रतियों की होगी और इसे 10 नवंबर को रिलीज़ किया जाएगा। भारत में इसे पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ही लाने वाली थी। लेकिन अब वह पीछे हट गई है।
सूत्रों के मुताबिक प्रकाशक ने पांडुलिपि के एक हिस्से में संपादकीय बदलाव और कुछ अंश हटाने को कहा मगर सोनिया गाँधी ने इनकार कर दिया। इसके बाद ख़बर है कि हार्परकॉलिन्स इसके राइट्स लेने के करीब है। न तो प्रकाशक ने बताया कि कौन-सा हिस्सा आपत्तिजनक था, न ही सोनिया गाँधी ने कुछ कहा है।
यह घटना अकेली नहीं है। हाल के महीनों में पेंगुइन इंडिया जो सैको की मुजफ्फरनगर दंगों वाली किताब और जनरल नरवणे के संस्मरणों को लेकर भी पीछे हट चुकी है। एक ही घराने की ये बार-बार की वापसी एक पैटर्न दिखाती है: कानूनी जांच, मानहानि का डर, नक्शे-सीमा जैसे ‘संवेदनशील’ बिंदु, या सत्ता-विपक्ष दोनों तरफ से संभावित प्रतिक्रिया।
प्रकाशन एक कारोबार है; मुकदमे और राजनीतिक दबाव उसके लिए महंगे साबित होते हैं। लेकिन जब एक ही प्रकाशक बार-बार ‘बदलाव के लिए कहे और लेखक तैयार न हो तो वह प्रकाशन से हट जाए, तो सवाल उठता है—संपादन कहाँ खत्म होता है और आत्म-सेंसरशिप कहाँ शुरू होती है।
सोनिया गांधी का मामला और पेचीदा है। नेहरू-गांधी परिवार की निजी आत्मकथा अपने आप में राजनीतिक दस्तावेज है। ऐसे पाठ में किसी भी कटौती का मतलब इतिहास के एक संस्करण को काटना हो सकता है। लेखिका का इनकार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आत्मकथा का मूल्य उसकी अपूर्णता और असुविधा में होता है, साफ-सुथरी आधिकारिक कथा में नहीं।
अंत में किताब छपेगी ही—अगर भारत में नहीं तो बाहर, अगर पेंगुइन से नहीं तो किसी और से। असली सवाल प्रकाशन का नहीं, विश्वास का है। क्या भारतीय पाठक को बिना काटे-छाँटे राजनीतिक आत्मकथा पढ़ने का हक है? और क्या बड़े प्रकाशक अब केवल वही छापेंगे जो विवाद से बचा रहे? Belonging का विवाद इन्हीं दो प्रश्नों को खुला छोड़ जाता है।
लेकिन आज की तारीख़ में सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या ये सरकार विपक्ष की एक महत्वपूर्ण नेता की अभिव्यक्ति को कुचलने की हद तक जा सकती है या उसने ऐसा वातावरण बना दिया है जिसमें वह संभव ही नहीं है?
आजतक अगर कह रहा है तो इस मामले में सही कह रहा है।
यूपी में बीजेपी डूब रही है और सपा+कांग्रेस की सरकार बन रही है ऐसा सबसे बड़ा सर्वे बता रहा है।
सपा+कांग्रेस को 41 संसदीय सीट यानी विधान सभा में 205+ सीट मिलने की संभावना है।यानी बहुमत इंडिया गठबंधन के साथ
















