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अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्,उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् (महोपनिषद्) (4)(17)

इंदौर (म. प्र) भारत
Joined August 2017
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#महाभारत (5.34.70) में हस्तिनापुरनरेश धृतराष्ट्र से महात्मा विदुर कहते हैं कि दुष्टों के साथ रहने पर सज्जन भी दु:ख प्राप्त करते हैं- असंत्यागात् पापकृतामपापां- स्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात्। शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावात् तस्मात् पापैः सह संधि न कुर्यात्॥ 1/2 @sankrant
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Imagine a student grading their own exam. That is the concern with Rule 11: institutional committees may approve certain animal experiments without prior central approval. Who independently checks the suffering? @narendramodi @Dept_of_AHD @AwbiBallabhgarh WITHDRAW THE DRAFT. tinyurl.com/4y9z92yy Mandate NAMs! Act: tinyurl.com/4y9z92yy #StopAnimalTesting #StopAnimalCruelty
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🌷 प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी महाराज खजराना, इन्दौर के श्रृंगार दर्शन, दिनांक 04 नवंबर 2026, बुधवार। #BudhwarDarshan #Indore #KhajranaGanesh #Ganeshji #IndoreTalk – at Indore, India
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असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः। असन्तोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्॥ धर्मराज युधिष्ठिर से महर्षि मार्कण्डेय कहते हैं - मूर्ख व्यक्ति असंतोष को अपना स्वभाव बना लेते हैं, जबकि विद्वान् संतोष को प्राप्त करते हैं। असंतोष का कोई अंत नहीं है, जबकि संतोष ही परम सुख है।
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असंतोषः परं पापम् इत्याह भगवान् हरिः । लोभः पापस्य बीजोऽयं मोहो मूलं च तस्य वै। असत्यं तस्य हि स्कन्धो महाशाखा सुविस्तरा॥ भगवान् श्रीविष्णु ने कहा है कि असंतोष परम पाप है। लोभ इस पाप का बीज है, मोह उसका मूल है और असत्य उसका तना है, जिसकी विशाल शाखाएं दूर-दूर तक फैली हुई हैं।
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सही बात राधे राधे 🌹
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आप सभी को सुप्रभात की शुभकामनाएं 💐💐
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असंतुष्टोऽसकृल्लोकान् आप्नोत्यपि सुरेश्वरः। अकिंचनोऽपि संतुष्टः शेते सर्वाङ्गविज्वरः॥ असंतुष्ट व्यक्ति इन्द्र का पद पाकर भी सुख के लिए भटकता रहता है और कहीं शांति नहीं पाता। इसके विपरीत, संतुष्ट रहने वाला व्यक्ति अल्प साधनों में भी सभी संतापों से मुक्त होकर सुखपूर्वक सोता है।
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जी सर, अब नई थीम के बारे में सोचना होगा नई थीम के लिए आप लोग सुझाव दीजिये, सबके सुझाव चाहिए मुझे #गीतों_की_महफ़िल का आत्मविश्वास और अनुशासन बड़ा पसन्द है! आपने 2000 गीत पोस्ट करने की इच्छा ज़ाहिर की और सबने मिलकर कर दिखाया इतनी खूबसूरत महफ़िल सजाने के लिए आप सभी का आभार 🙏
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इंदौर... एक ऐसा शहर जहाँ लाखों लोगों के सपनों को घर देने के लिए हजारों इमारतें खड़ी हो रही हैं। लेकिन इसी शहर में हजारों परिंदों का बसा-बसाया संसार उजड़ने की कगार पर है। 🦜 रानी सराय के वे पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं थे... वे हजारों तोतों की दुनिया थे। उनकी पीढ़ियों का आशियाना, उनकी पहचान और उनका अस्तित्व थे। आज वहाँ विकास के नाम पर आरी चल रही है। एक सवाल हम सबके सामने है... जब हम अपने बच्चों के लिए बेहतर शहर बना रहे हैं, तो क्या हम उनसे वह प्रकृति भी छीन रहे हैं, जिसमें कभी परिंदों की आवाज़ गूँजती थी? हम जमीन की कीमत लगा सकते हैं, पेड़ों की लकड़ी की कीमत लगा सकते हैं, लेकिन क्या किसी उजड़े हुए आशियाने और खत्म होती एक दुनिया की कीमत लगा सकते हैं? मेट्रो भी चाहिए, इमारतें भी चाहिए, विकास भी चाहिए... लेकिन क्या यह सब प्रकृति को बचाकर नहीं हो सकता? याद रखिए, जिस शहर के आसमान से परिंदे गायब हो जाएँ, उसकी ऊँचाई चाहे जितनी बढ़ जाए, उसकी खूबसूरती कहीं न कहीं कम हो जाती � – at Indore, India
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यह बेहद दुखद है। इंदौर की पहचान हमेशा उसकी संवेदनशीलता, संस्कार और अपनत्व से रही है। ☹️
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Exactly! They are not just trees, they are home to thousands of parrots.
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'तोते आज इस पेड़ पर, कल दूसरे पेड़ पर उड़ जाएंगे' : मेट्रो की दलील। 🦜🦜 इंदौर के बीचों-बीच, रीगल चौराहे के पास स्थित रानी सराय के कुछ पेड़ों पर पिछले 50–60 वर्षों से लाखों तोतों का बसेरा रहा है। शाम होते ही न जाने आसपास के जंगलों और शहर के अलग-अलग इलाकों से ये तोते उड़कर पूरे शहर को पार करते हुए इन पेड़ों पर अपना आशियाना बनाने पहुंचते थे। रातभर यहां आराम करने के बाद सुबह होते ही सभी अपने-अपने ठिकानों की ओर लौट जाते थे। यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा था। शाम ढलते ही तोतों की मीठी चहचहाहट पूरे चौराहे को एक अलग ही खूबसूरती से भर देती थी। वहां से गुजरने वाला हर व्यक्ति कुछ पल के लिए ठहरकर इस अद्भुत नजारे को देखने और सुनने पर मजबूर हो जाता था। लेकिन अब इंदौर में मेट्रो का काम चल रहा है। शहर के बीचों-बीच मेट्रो स्टेशन और अन्य निर्माण कार्यों के लिए जगह-जगह पेड़ों की कटाई की जा रही है। इसी क्रम में रानी सराय में भी मेट्रो स्टेशन के निर्माण के कारण इन पेड़ों को काटा जा रहा है। अब जब शाम ढलती है और ये तोते अपने पुराने आशियाने में लौटते हैं, तो वहां उनके लिए कुछ नहीं बचा है। उनका वर्षों पुराना बसेरा उजड़ चुका है। ये बेजुबान पक्षी रातभर इधर-उधर भटकते रहते हैं और दूसरे पेड़ों पर अपना ठिकाना तलाशते हैं। जिस जगह पर कभी लाखों तोतों की चहचहाहट गूंजती थी, आज वहां उनका आशियाना छिन चुका है। पूरा शहर इनकी इस परेशानी को देख रहा है। ये सिर्फ पेड़ नहीं थे, बल्कि हजारों-लाखों पक्षियों का वर्षों पुराना घर और इंदौर की एक अनमोल प्राकृतिक विरासत थे। मेट्रो और विकास शहर की जरूरत हैं, लेकिन क्या विकास के नाम पर उन बेजुबान जीवों का घर उजाड़ देना जरूरी है, जो दशकों से इसी जगह को अपना आशियाना मानते आए हैं? विकास जरूर कीजिए लेकिन प्रकृति और बेजुबान जीवों की कीमत पर नहीं।
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असंतोषः परं दुःखं संतोषः परमं सुखम्। सुखार्थी पुरुषस्तस्मात् संतुष्टः सततं भवेत्॥ असंतोष सबसे बड़ा दुःख है और संतोष सबसे बड़ा सुख, इसलिए सुख की इच्छा रखने वाले मनुष्य को सदैव संतुष्ट रहना चाहिए। #पद्मपुराण (सृष्टि खण्ड - 19.261) @meenakshisharan @Sanatan_Science @Eternaldharma_
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असंतुष्टा द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभृतः। सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलाङ्गना॥ असंतुष्ट ब्राह्मण, संतुष्ट राजा, लज्जाशील गणिका व निर्लज्ज कुलवधू नष्ट हो जाती हैं। Discontented Brahmanas, contented kings, chaste courtezans and unchaste noblewomen perish. #Chanakya (110)
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🌳🦜 सुबह जिन पेड़ों से उड़ते थे सैकड़ों पंछी, शाम को लौटे तो आशियाने ही कटे हुए जमीन पर मिले। विकास की मशीनें चलती रहीं, परिंदों के घर उजड़ते रहे। इंदौर के रानी सराय परिसर में पेड़ों की कटाई की खबर सिर्फ पेड़ों के काटने की कहानी नहीं है। यह उन सैकड़ों पक्षियों की कहानी भी है, जिनके लिए वही पेड़ घर थे, ठिकाना थे, पूरी दुनिया थे। सुबह जो परिंदे आसमान में दाना खोजने निकले, शाम को लौटे तो शायद उन्हें पता ही नहीं चला होगा कि उनका घर अब वहाँ है ही नहीं। कितनी अजीब बात है! इंसान विकास के नाम पर नक्शे बनाता है, मशीनें चलाता है, रास्ते चौड़े करता है और प्रकृति के बाकी जीवों से उनका घर छीनकर पूछता तक नहीं कि तुम अब जाओगे कहाँ? एक गीत की पंक्ति याद आती है “हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे…” और उस अंतरे का दर्द, जिसमें पंछी से उसका घर छीन लिए जाने की बात आती है। प्रेम में अपना संसार खो देने का दर्द इंसान गीतों में गाता है, लेकिन जब वही बेघर होने का दर्द किसी पंछी पर गुजरता है, तो क्या हमें कुछ महसूस होता है? हम अपने घर की एक खिड़की टूटने पर बेचैन हो जाते हैं। फिर उन परिंदों की बेचैनी कौन समझेगा, जिनका पूरा आशियाना एक ही दिन में उजड़ गया? वे शिकायत कहाँ दर्ज कराएँगे? किस अधिकारी के दरवाजे जाएँगे? किससे कहेंगे कि साहब, विकास करिए लेकिन हमारा घर तो रहने दीजिए! विकास जरूरी है। सड़कें, मेट्रो, इमारतें और बेहतर सुविधाएँ भी जरूरी हैं। लेकिन क्या विकास का मतलब सिर्फ कंक्रीट बढ़ाना और हरियाली घटाना है? क्या हर पेड़ रास्ते की रुकावट है और हर पक्षी केवल एक अदृश्य नुकसान? अगर किसी परियोजना के लिए पेड़ काटना अपरिहार्य है, तो सवाल यह है कि क्या कम नुकसान वाले विकल्पों की पूरी पड़ताल हुई? क्या पक्षियों के घोंसलों और उनके प्रजनन काल का ध्यान रखा गया? क्या हरित क्षेत्र बचाने की ठोस योजना है और क्या लगाए जाने वाले नए पौधे पुराने, विकसित पेड़ों की पारिस्थितिक भूमिका निभाने के लिए पर्याप्त होंगे? एक पेड़ काटकर उसकी जगह पौधा लगा देना हिसाब बराबर करना नहीं है। पुराने पेड़ की छाया, घोंसले, भोजन और वर्षों में बना पारिस्थितिक संसार एक दिन में वापस नहीं आता। हम शहर को स्मार्ट बनाना चाहते हैं। लेकिन स्मार्टनेस सिर्फ चौड़ी सड़कों और ऊँची इमारतों में नहीं, उस संवेदना में भी होती है जो इंसान को अपने अलावा दूसरे जीवों के अधिकार याद दिलाती है। क्योंकि जिस विकास में इंसान के लिए जगह बढ़ती जाए और प्रकृति के लिए जगह घटती जाए, वहाँ तरक्की का उत्सव मनाने से पहले उसकी कीमत पूछना जरूरी है। आखिर सवाल यह नहीं कि शहर कितना बड़ा हुआ। सवाल यह है कि उसे बड़ा बनाते-बनाते हमने कितने जीवों की दुनिया छोटी कर दी। याद रखिए पेड़ सिर्फ पत्ते और लकड़ी नहीं, किसी का घर भी है और आसमान में उड़ता हर पंछी सिर्फ एक परिंदा नहीं, इस धरती पर जीवन का साझेदार है। विकास कीजिए, मगर इतना भी नहीं कि शाम को लौटते पंछियों को अपना ही आसमान पराया लगने लगे। — टीम इंदौर टॉक #Indore #SaveTrees #UrbanDevelopment #Biodiversity #IndoreTalk – at Indore, India
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भगवान् महर्षि वाल्मीकि : करुणा से उदित काव्य का अमर प्रकाश ! "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।।" भारतीय काव्य परम्परा में यह श्लोक करुणा के छन्दोमय उद्गार का अमर प्रतीक है। तमसा के तट पर क्रौञ्चयुगल के एक पक्षी का वध और उसकी सहचरी का आर्तनाद देखकर भगवान् महर्षि वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठा। उसी संवेदना से वह वाणी प्रकट हुई, जिसमें अन्याय के प्रति प्रतिकार और प्राणिमात्र के दुःख के प्रति करुणा एक साथ मुखर हुई। आदिकाव्य के उद्भव का यह प्रसंग स्मरण कराता है कि उत्कृष्ट साहित्य की मूलभूमि जीवन के प्रति गहरी संवेदनशीलता है। श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में ब्रह्मा महर्षि को श्रीराम का सम्पूर्ण चरित काव्यबद्ध करने की प्रेरणा देते हैं। इस प्रकार ऋषि की तपःपूत प्रतिभा और दिव्य प्रेरणा के संयोग से रामकथा को ऐसा काव्यरूप प्राप्त हुआ, जिसमें धर्म का गाम्भीर्य और मानवीय अनुभूतियों का माधुर्य साथ प्रवाहित होते हैं। महर्षि की लेखनी में परात्पर ब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का चरित्र सत्य, शील, धैर्य और करुणा का सजीव आलोक बनकर उपस्थित होता है। “रामो विग्रहवान् धर्मः” का उद्घोष इसी चरित्र की अन्तःप्रतिष्ठा को व्यक्त करता है। सीता की अडिग निष्ठा, भरत का निष्काम त्याग, लक्ष्मण की समर्पित सेवा और हनुमान की प्रज्ञापूर्ण भक्ति रामायण को जीवनमूल्यों का अक्षय निधि बनाते हैं। प्रभु श्री राम की लीलाओं में दिखते जीवन के विविध आयामों में साधक अपने जीवन के प्रश्नों को पहचानता है और धर्म के सूक्ष्म स्वरूप पर विचार करना सीखता है। "वाल्मीकि जयन्ती" उसी ऋषिदृष्टि का अभिनन्दन है, जिसने करुणा को काव्य, चरित्र को आदर्श और रामकथा को लोकमङ्गल की अमृतधारा बनाया। इस पावन अवसर पर हमारी वाणी सत्य से सुशोभित हो, हृदय परपीड़ा से द्रवित हो और आचरण मर्यादा से आलोकित हो। भगवान् आद्यकवि महर्षि वाल्मीकि के आविर्भावोत्सव की हार्दिक मङ्गलकामनाएँ। उनके तपःपूत काव्य का प्रकाश समस्त मानवता को करुणा, सदाचार और धर्मनिष्ठा की प्रेरणा देता रहे। #AvdheshananadG_Quotes #AvdheshanandG_Mission #वाल्मीकि_जयन्ती #श्रीमद्बाल्मिकीय_रामायण – at New Delhi, India
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असञ्चयात् अपूर्वस्य क्षयात् पूर्वाजितस्य च। कर्मणो बन्धमाप्नोति शारीरं न पुनः पुनः॥ कर्मों के भावी फल का संचय न होने और पूर्व संचित कर्मों के फल का क्रमशः क्षय होते जाने से मनुष्य का शरीर बार-बार कर्मफल के बंधन में नहीं पड़ता। #शार्ङ्गधरपद्धति (4423) @Sanatan_Science @sankrant
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काशाः क्षीरनिकाशा दधिवरवर्णानि सप्तपर्णानि। नवनीतनिभश्चन्द्रः शरदि च तक्रप्रभाज्योत्स्ना॥ शरद् ऋतु में (शरत्पूर्णिमा के) चन्द्र की ज्योत्स्ना काश के लम्बे श्वेत पुष्पों के समान, सप्तपर्ण वृक्ष की छाल के समान, नवनीत के समान व तक्र के फेन के समान धवल और उज्ज्वल होती है। #गण्डगोपाल
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