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नेहरू कहां थे?
मुख्यमंत्री योगी के इस सवाल पर कोई आश्चर्य नहीं!
इसका जवाब बहुत सारे लोगों ने दे दिया है। खुद लखनऊ जेल के अधिकारी भी बता रहे हैं कि साहब यहां दर्ज है कि वे उस समय इस जेल में बंद थे।
दूसरी क्लिपिंग।
मगर इससे क्या?
झूठ और अफवाहें फैला कर ही तो यह सत्ता में आए हैं।
मोदी ने कहा था नेहरू पटेल की अंतिम यात्रा में नहीं गए थे।
उसका भी फोटो दूसरे दिन आ गया था।
देखें चित्र अंतिम।
झूठ और अफवाहें फैलाने के लिए यह किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। और सबसे दिलचस्प तब होता है जब यह आपस में एक दूसरे खिलाफ इसका उपयोग करते हैं।
उमा भारती वाजपेयी और कई नेताओं के खिलाफ कर चुके हैं।
आगे भी करेंगे!
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योगी आदित्यनाथ जी, इतिहास के सवाल उठाने से पहले इतिहास पढ़ लेना चाहिए।
आप पूछ रहे हैं कि चौरी-चौरा कांड के समय जवाहरलाल नेहरू कहां थे?
जवाब है—वे अंग्रेजों की जेल में थे!
6 दिसंबर 1921 को गिरफ्तार हुए नेहरू 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा की घटना के समय लखनऊ जिला जेल में बंद थे। 3 मार्च 1922 को रिहा हुए।
जहां तक 172 लोगों को फांसी की सजा सुनाए जाने का सवाल है, महामना मदन मोहन मालवीय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी पैरवी की। मोतीलाल नेहरू की भूमिका का भी ऐतिहासिक उल्लेख है।
इतिहास का एक और तथ्य जान लीजिए—इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 1923 को 19 लोगों की फांसी की सजा बरकरार रखी, जबकि 38 लोगों को बरी किया और बाकी की सजाएं बदल दीं।
इसलिए 172 लोगों को वास्तव में फांसी दे दिए जाने जैसा भ्रम पैदा मत कीजिए।
इतिहास किसी दल की जागीर नहीं है। नेहरू से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों को छिपाकर नहीं।
और हां, जेल में बंद एक स्वतंत्रता सेनानी से यह सवाल पूछना कि वह अदालत में पैरवी करने क्यों नहीं आया, इतिहास की समझ नहीं, राजनीतिक प्रोपेगेंडा है।
योगी आदित्यनाथ जी, इतिहास के सवाल उठाने से पहले इतिहास पढ़ लेना चाहिए।
आप पूछ रहे हैं कि चौरी-चौरा कांड के समय जवाहरलाल नेहरू कहां थे?
जवाब है—वे अंग्रेजों की जेल में थे!
6 दिसंबर 1921 को गिरफ्तार हुए नेहरू 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा की घटना के समय लखनऊ जिला जेल में बंद थे। 3 मार्च 1922 को रिहा हुए।
जहां तक 172 लोगों को फांसी की सजा सुनाए जाने का सवाल है, महामना मदन मोहन मालवीय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी पैरवी की। मोतीलाल नेहरू की भूमिका का भी ऐतिहासिक उल्लेख है।
इतिहास का एक और तथ्य जान लीजिए—इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 1923 को 19 लोगों की फांसी की सजा बरकरार रखी, जबकि 38 लोगों को बरी किया और बाकी की सजाएं बदल दीं।
इसलिए 172 लोगों को वास्तव में फांसी दे दिए जाने जैसा भ्रम पैदा मत कीजिए।
इतिहास किसी दल की जागीर नहीं है। नेहरू से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों को छिपाकर नहीं।
और हां, जेल में बंद एक स्वतंत्रता सेनानी से यह सवाल पूछना कि वह अदालत में पैरवी करने क्यों नहीं आया, इतिहास की समझ नहीं, राजनीतिक प्रोपेगेंडा है।
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"आरएसएस के भाषण सांप्रदायिक उत्तेजना से भरे हुए होते है। देश को इस ज़हर का अंतिम नतीजा महात्मा गांधी की बेशक़ीमती ज़िंदगी की शहादत के तौर पर भुगतना पड़ा है।"
-सरदार पटेल
"आरएसएस के भाषण सांप्रदायिक उत्तेजना से भरे हुए होते है। देश को इस ज़हर का अंतिम नतीजा महात्मा गांधी की बेशक़ीमती ज़िंदगी की शहादत के तौर पर भुगतना पड़ा है।"
-सरदार पटेल
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लॉरेंस बिश्नोई को ‘लॉरेंस बिश्नोई साहब’ कहकर संबोधित करना केवल शब्दों का प्रयोग नहीं, बल्कि सम्मान की सामाजिक परिभाषा पर भी सवाल खड़ा करता है।
लॉरेंस बिश्नोई को ‘लॉरेंस बिश्नोई साहब’ कहकर संबोधित करना केवल शब्दों का प्रयोग नहीं, बल्कि सम्मान की सामाजिक परिभाषा पर भी सवाल खड़ा करता है।
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"राजनीति में हिस्सा ना लेने का सबसे बड़ा दंड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आप पर शासन करने लगता है।"
-भीमराव अंबेडकर
"राजनीति में हिस्सा ना लेने का सबसे बड़ा दंड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आप पर शासन करने लगता है।"
-भीमराव अंबेडकर
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“गोडसे को कितना भी पूजो, आख़िर में बापू के रास्ते पर ही चलना पड़ेगा।”
-तुषार गांधी
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"मैं भारत में हर चुनाव हारने के लिए तैयार हूँ, मगर साम्प्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ावा देने के लिए हरगिज़ नहीं।"
-जवाहरलाल नेहरू
"मैं भारत में हर चुनाव हारने के लिए तैयार हूँ, मगर साम्प्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ावा देने के लिए हरगिज़ नहीं।"
-जवाहरलाल नेहरू
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इतिहास स्वयं को दोहरा नहीं रहा, बल्कि हमारे समय का आईना दिखा रहा है।
महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी को मुंबई में उस वक्त हिरासत में ले लिया गया, जब वे प्रदर्शन में शामिल होने के लिए अगस्त क्रांति मैदान जा रहे थे।
विडंबना देखिए—जिस अगस्त क्रांति मैदान से 1942 में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का बिगुल बजा था, उसी ऐतिहासिक विरासत की ओर बढ़ते एक गांधीवादी को आज हिरासत का सामना करना पड़ रहा है।
इतिहास सवाल पूछेगा—सत्ता ने विरोध की आवाज़ को सुना या उसे रोकने की कोशिश की?
इतिहास स्वयं को दोहरा नहीं रहा, बल्कि हमारे समय का आईना दिखा रहा है।
महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी को मुंबई में उस वक्त हिरासत में ले लिया गया, जब वे प्रदर्शन में शामिल होने के लिए अगस्त क्रांति मैदान जा रहे थे।
विडंबना देखिए—जिस अगस्त क्रांति मैदान से 1942 में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का बिगुल बजा था, उसी ऐतिहासिक विरासत की ओर बढ़ते एक गांधीवादी को आज हिरासत का सामना करना पड़ रहा है।
इतिहास सवाल पूछेगा—सत्ता ने विरोध की आवाज़ को सुना या उसे रोकने की कोशिश की?












