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अगर दलितों को अपना उद्धार करना है, अगर वे स्वयं को सशक्त करना चाहते हैं तो दूसरे (ब्राह्मणवादी)- दलित सशक्तिकरण की बात करेंगे, लेकिन उनको सत्ता में आने से रोकेंगे।
इसलिए मैं समझता हूँ -दलितों को जो गैर-दलित(ब्राह्मणवादी)- हैं, उनके 'दलित प्रेम' से सावधान रहना चाहिए।
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In my reading of Dr Ambedkar, Buddhism doesn't differ from Marxism in its end goal of achieving a socialist state. Dr Ambedkar's contention was only at the means to achieve it. Mental revolution instead of physical violence was his suggested means.
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“I generally avoid focusing on caste, but as a Brahmin woman myself,...”
— Priyanka Chaturvedi, Shiv Sena
#WATCH | Delhi: On Neha Bora's controversial remarks, Shiv Sena (UBT) leader Priyanka Chaturvedi says, "It is highly unfortunate. While I believe this may be an old video, it reveals a mindset that asserts rapes happen in temples, are committed by priests, and that Brahmin women are unsafe. I generally avoid focusing on caste, but as a Brahmin woman myself, I must ask: is it appropriate to use such derogatory language? I have always maintained that this kind of radical thinking—whether from the Left or the Right—is harmful to the nation. I would like to sit down with Neha Bora and explain that not everything should be viewed through the lens of caste or religion. She is young, talented, bright, and smart, with the drive to fight for a cause; she ought to use her intellect more constructively..."
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जयदीप जोगेंद्र कवाडे ह्यांच्या नवीन घराचे वास्तुपूजन होते.
ह्याच लोकांनी "बौद्ध धम्म" बाटवला.
धम्म आणि राजकारण एकत्र करतात.
धम्माला तुमच्या राजकारणापासून लांब ठेवा.
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आखिर कितने और दलित विद्यार्थियों को इस व्यवस्था की कीमत चुकानी होगी? कितने और परिवार न्याय के लिए अकेले संघर्ष करेंगे?
अब चुप्पी नहीं चलेगी! साहिल वाकोडे के परिवार के साथ खड़े हों। न्याय की मांग करें।
5 नवंबर | सुबह 11 बजे | संविधान चौक, नागपुर
चलो संविधान चौक!
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On the one side, lived experience is cheap thing for Savarna but to argue against Ambedkar they always have one Dalit friend or Dalit thinker. If lived experience is cheap we will live with our cheap existence to fight against your Vulgarity of ideology.
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"I believe, my people will sacrifice everything to establish Buddhism in India"
Bodhisattva Dr. Babasaheb Ambedkar🙏🏻☸️⛩️
पण बौद्ध समाज पुरोगामी,सत्यशोधक यांच्या नादी लागून धम्माकडे दुर्लक्ष करतोय
डॉ बाबासाहेबांनी तुम्हाला बुद्ध धम्मात आणून बौद्ध बनविले. त्यांचे स्वप्न तोडू नका
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This is a war, a war for dignity, justice and for our freedom.
Jai Bhim
#justiceforsahil
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कब तक चुप रहेंगे?
कब तक हमारे बच्चे संस्थानों में जाति की कीमत चुकाते रहेंगे?
साहिल वाकोडे को न्याय दो!
अब वक्त है कि आंबेडकरवादी समाज घरों से बाहर निकले और इस लड़ाई में अपनी एकजुटता दिखाए।
साहिल के माता-पिता अकेले नहीं हैं।
उनका संघर्ष हमारा संघर्ष है!
विरोध प्रदर्शन
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రోహిత్ వేముల 2014లోనే నేహా బోరా రాజకీయాన్ని బయటపెట్టాడు.
youtube.com/watch?v=-1BCMDGl…
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नेहा बोरा जी तुम्ही छान काम करत होत्या म्हणून आंबेडकरवादी तुम्हाला समर्थन करायचे. पण काँग्रेस सोबत मैत्री होताच तुम्ही भाजपा ला सोडून आंबेडकरी नेत्यांना बोलू लागल्या येवढ्या मोठ्या तुम्ही नाहीच.
कुठला ही अन्याय अत्याचार असो आंबेडकरवादी लढायला उभे असतात.
अभिजित दिपके च्या
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RSS एक आतंकवादी संगठन है ,ये देश में दंगे कराते है भाईचारे को खत्म करते है शिक्षा के विरोधी है भारत के मूल निवासी भी नहीं है इनको देश से निकाल देना चाहिए ये ज़ाहिल लोग है ,
ये सब एक 60 साल का बुजुर्ग बोल रहा है वीडियो देखे ,,,👇
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బీజేపీది డబుల్ ఇంజన్ సర్కార్ కదా..
అందుకే పెట్రోల్ ఎక్కువగా తాగుతోంది
- ఇథనాల్ మీద ఆకాశ్ ఆనంద్ సెటైర్లు
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Communism of the Russian type aims to bring it about by a bloody revolution. The Buddhist Communism brings it about by a bloodless mental revolution.
- Dr. B. R. Ambedkar (12th may, 1956)
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110 revered Thai Buddhist monks arrived last night at Dr. Babasaheb Ambedkar International Airport, Nagpur, for the historic Shanti Sandesh Dhamma Yatra. The grand peace procession will begin at Automotive Square and culminate at sacred Deekshabhoomi.🇹🇭☸️🇮🇳
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सुनिए
सफलता झक मारकर नहीं आती
आईआईटी पटना के रजिस्ट्रार के कथित बयान पर तथ्यों की रोशनी में
आईआईटी पटना के रजिस्ट्रार ए.के. ठाकुर ने कहा "काबिल मत बनो, दलित बनो, सफलता झक मारकर आएगी" , यह वाक्य जिस सोच का प्रतिनिधि है वह किसी एक पोस्ट से बड़ी है। उसे जवाब चाहिए और जवाब गाली से नहीं आंकड़ों से बनता है।
पहली विडंबना की ये बाबासाहेब के नारे का उलटा है,
बाबासाहेब का सूत्र था शिक्षित बनो,संगठित रहो, संघर्ष करो और उसमें पहला ही शब्द शिक्षा है।जिस समाज ने सदियों तक पढ़ने की मनाही झेली उसने योग्यता को सबसे बड़ा हथियार बनाया ऐसे में "काबिल मत बनो" कहना उसी हथियार को छीनने की सलाह है और "सफलता झक मारकर आएगी" कहना उस संघर्ष को मुफ्तखोरी का नाम देना है ।
आंकड़ों की अदालत
अगर दलित होना सफलता की गारंटी होता तो आंकड़े उलटे दिखते जो उलटे है भी नहीं।
बिहार जाति सर्वे (2023):अनुसूचित जाति के 42.93% परिवार गरीब (₹6,000 मासिक आय तक) हैं जबकि सामान्य वर्ग में 25.09%। उसी सर्वे में: सामान्य वर्ग के 13.41% लोग स्नातक हैं और अनुसूचित जाति के सिर्फ 3.05%।
राष्ट्रीय तस्वीर (NSS 75वां दौर, 2017-18):एससी में लगभग 4% स्नातक हैं जबकि सामान्य वर्ग में 12% से ऊपर।
नौकरी के बाज़ार में: सुखदेव थोराट और पॉल एटवेल के प्रसिद्ध प्रयोग में एक-जैसी योग्यता वाले आवेदनों में दलित नाम वालों के सफल होने की संभावना ऊँची जाति के नाम के मुकाबले महज़ 0.67 गुना रही।एक अन्य शोध में निम्न जाति के आवेदकों को उतने ही कॉलबैक के लिए लगभग 20% ज़्यादा रिज़्यूमे भेजने पड़े यानी आरक्षण दरवाज़ा खोलता है मंज़िल नहीं देता और दरवाज़े के भीतर की सीढ़ियाँ अब भी बराबर नहीं हैं।
आईआईटी का आईना
जिस संस्थान का पद इस बहस के केंद्र में है उसी व्यवस्था का हाल देखिए । आईआईटी में एससी-एसटी फैकल्टी 3% से भी कम बताई गई है। द हिंदू की पड़ताल (आंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल के आरटीआई आंकड़ों पर आधारित) के मुताबिक 2015 से 2019 के बीच आईआईटी बॉम्बे के 26 में से 25 विभाग एससी और ओबीसी के लिए आरक्षित पीएचडी सीटें पूरी नहीं भर सके और कई विभागों ने इस दौरान एक भी एसटी छात्र दाखिल नहीं किया।जहाँ आरक्षित सीटें ही खाली रह जाती हों वहाँ "आरक्षण से सब मिल जाता है" का दावा तथ्य नहीं कल्पना है। आईआईटी कानपुर में जातिगत उत्पीड़न के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय को टिप्पणी करनी पड़ी कि संस्थान के शिक्षकों का आचरण अनुकरणीय होना चाहिए।
सुरक्षा का हिसाब
एनसीआरबी के अनुसार 2023 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध 57,789 अत्याचार-मामले दर्ज हुए और यह लगभग 158 मामले रोज़ का औसत है। बिहार में 7,064 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 42.6 प्रति लाख रही जबकि राष्ट्रीय दर 28.7 है। सज़ा की दर 2022 में 32.4% रही यानी दोषसिद्धि अब भी हर तीन में से एक मामले में ही हो पाती है।
क्या बयानबाज़ी सचमुच बढ़ रही है?
ईमानदार उत्तर यह है कि भारत में "जातिगत बयानबाज़ी" को मापने वाला कोई राष्ट्रीय सरकारी आंकड़ा नहीं है, और दर्ज मामलों में बढ़ोतरी का एक हिस्सा बेहतर रिपोर्टिंग भी हो सकता है फिर भी संकेत एक ही दिशा में हैं। सियासत डॉट कॉम के मासिक ट्रैकर ने जनवरी 2026 में मुसलमानों, दलितों और ईसाइयों के विरुद्ध कम से कम 42 घृणा-अपराध और घृणा-भाषण दर्ज किए।तेलंगाना में जुलाई-सितंबर 2026 के बीच 20 ऐसी घटनाएँ गिनी गईं जिनमें दलितों के चलने के बाद सड़क को "शुद्ध" करने जैसी घटना भी शामिल है।2019 की इक्वालिटी लैब्स रिपोर्ट के अनुसार भारत में फेसबुक की घृणा-सामग्री का लगभग 13% जाति-आधारित था। नागरिक संगठनों की रिपोर्टें इस प्रवृत्ति को दलितों की बढ़ती शिक्षा,दृश्यता और दावेदारी की प्रतिक्रिया के रूप में पढ़ती हैं !
शॉर्टकट" वाला भ्रम की दलित बनो सफलता आएगी" वाक्य की गड़बड़ी तीन परतों में है। पहली यह मान लेता है कि दलित सफलता योग्यता से नहीं जाति से पाते हैं , यह हर उस दलित छात्र का अपमान है जिसने कठिन परीक्षा पास की। दूसरी यह गुमनाम बहुमत को अनदेखा करता है: गाँव का वह बच्चा जिसे स्कूल, कोचिंग, घर में किताबें, सब कुछ कम मिला। तीसरी, यह एक संवैधानिक उपचार को उपकार की तरह पेश करता है। अनुच्छेद 15, 16 और 46 कृपा नहीं हैं, ऐतिहासिक अन्याय की मरम्मत का वादा हैं। किसी शॉर्टकट पर तीन प्रतिशत स्नातक नहीं मिलते। जो रास्ता इतनी बाधाओं से भरा हो, उसे शॉर्टकट कहना या तो अज्ञान है या अहंकार ?
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