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मोहन भागवत से सवाल पूछा कि 52 साल तक RSS मुख्यालय पर तिरंगा क्यों नहीं फहराया...?
सवाल क्या पूछा है और जवाब क्या दिया है...🤷🏼♀️
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Fraand … you and a dead swamiji in conversation on AI ??? 😂😂😂😂. Deadlyyyyy #justasking
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1943 में नेताजी ने कहा "दिल्ली चलो", अंग्रेज़ी हुकूमत हिल गई।
2026 में राहुल गांधी ने कहा "चलो दिल्ली", और इंस्टाग्राम पर पोस्ट ही ग़ायब कर दी गई
एक तस्वीर से इतना डर? मोदी सरकार पोस्ट हटा सकती है, जनता की आवाज़ नहीं
1 नवंबर, रामलीला मैदान
#ChaloDilli #VoteChori @RahulGandhi
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जनता ने नहीं ज्ञानु ने बैठाया है.. चोर @LucknowMsk @pbhushan1 @rajender14345 @nareshsharma107 @Ravindr99596593 @rudran2412 @_Sweet_Parul_ @sanju1000
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अमित शाह राजनीति के मास्टरमाइंड हैं… फिर ऐसी कौन-सी बिसात बिछ रही है, जिसमें युवा, पुलिस और संस्थाएँ आमने-सामने हैं,
मोदी की छवि दाँव पर है और फायदा विपक्ष को ?
मास्टरस्ट्रोक या सियासी चूक? क्रोनोलॉजी समझिए!
@_Sweet_Parul_
@CommonBS786OM
@INCIndia
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इत्र-ए-अम्बर की ख़ुशबू में शब-ए-रवानी भी थी...
तेरी महक में मगर मेरे इश्क़ की कहानी भी थी...
~ Minal Sultan
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चुनाव आयोग के हलफनामे का रितिका चोपड़ा ने पोस्टमार्टम कर दिया है .
एक - एक पॉइंट का जवाब दिया है .
कल केंचुआ का हलफनामा आते ही सरकारी पत्रकार कूदने लगे थे .
अपनी पत्रकारिता को मोदी के दरबार में गिरवी रखने वाले लोग @RitikaChopra__ का जवाब पढ़ें .
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जानता हीं नहीं मुझे शायद खोने वाला.,
मसला मिल के भी अब हल नहीं होने वाला..!!
#ناز
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सुकून से नींद के खातिर अपने कर्तव्यों को
बड़ी ईमानदारी से अनुपालन करना पड़ता है !💐💚
शुभ रात्रि 🌃🌺🌺🙏🙏❤️
शब बा खैर मेरे प्यारे दोस्तों 🌃🌹🌹🙏🙏❤️
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The look of love is saying so much more than just words could ever say.
— Dusty Springfield
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Replying to @SrBachchan
@SrBachchan
# पेट्रोल ₹7.50 महँगा हो गया। पेट्रोल पंप वाला पूछता है, “कितने का डालूँ?” मुंबई का आदमी कहता है, “दो-चार रुपये का गाड़ी पर छिड़क दे भाई, जलानी है!”
वैसे भी 2014 के बाद आप कुछ लिख नहीं पा रहे थे। ब्रेक लेने में देर कर दी सर
@SrBachchan
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धर्म की शिकार सबसे ज्यादा महिलाएँ ही क्यों होती हैं?
धर्म का उद्देश्य यदि मनुष्य को नैतिकता, करुणा, प्रेम और समानता का मार्ग दिखाना है, तो एक बुनियादी सवाल उठना स्वाभाविक है:--
धार्मिक परंपराओं, रूढ़ियों और कर्मकांडों का सबसे अधिक बोझ अक्सर महिलाओं के कंधों पर ही क्यों डाला जाता है?
महिलाओं को कभी पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखने को कहा जाता है, तो कभी परिवार की सुख-समृद्धि के लिए उपवास करने को।
कभी उनके पहनावे पर पहरे लगाए जाते हैं, तो कभी उनकी स्वतंत्रता को परिवार की प्रतिष्ठा और धर्म की मर्यादा से जोड़ दिया जाता है।
सवाल यह है कि यदि पति-पत्नी का रिश्ता समानता पर आधारित है, तो पति अपनी पत्नी की लंबी उम्र के लिए उसी तरह व्रत क्यों नहीं रखता, जैसे पत्नी अपने पति के लिए रखती है?
यहाँ समस्या केवल धर्म की नहीं, बल्कि धर्म की आड़ में स्थापित उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था की भी है, जो पुरुषों को अधिकार और महिलाओं को कर्तव्य सौंपती है।
1. धर्म और पितृसत्ता का गठजोड़
इतिहास के अनेक समाजों में धर्म की व्याख्या करने, धार्मिक नियम बनाने और सामाजिक मान्यताओं को निर्धारित करने की शक्ति मुख्यतः पुरुषों के हाथों में रही है।
परिणामस्वरूप, कई धार्मिक परंपराओं में पुरुषों को निर्णय लेने वाला और महिलाओं को उन निर्णयों का पालन करने वाला बनाया गया।
महिलाओं की भूमिका को पत्नी, माँ, बहू और बेटी के दायरे में सीमित करने वाली मान्यताओं ने उनकी स्वतंत्र पहचान को कमजोर किया।
हालाँकि, सभी धर्मों और धार्मिक परंपराओं को एक जैसा नहीं माना जा सकता। विभिन्न धर्मों के भीतर समानता, स्वतंत्रता और महिला अधिकारों के पक्ष में भी आवाजें उठती रही हैं।
समस्या तब पैदा होती है, जब किसी धार्मिक व्याख्या को अंतिम सत्य घोषित करके महिलाओं के अधिकारों को सीमित किया जाता है।
2. महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण
महिलाओं के पहनावे, विवाह, यौनिकता, मासिक धर्म और मातृत्व से जुड़े नियम अनेक समाजों में उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं।
कई बार महिलाओं के शरीर को परिवार की इज्जत, समुदाय की शुद्धता और धार्मिक मर्यादा का प्रतीक बना दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप, महिलाओं के व्यक्तिगत निर्णय भी सामाजिक निगरानी के विषय बन जाते हैं।
पुरुष क्या पहनेगा, कहाँ जाएगा और किससे मिलेगा—इन सवालों पर समाज का नियंत्रण अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इसके विपरीत, महिलाओं के लिए अनेक अतिरिक्त नियम निर्धारित कर दिए जाते हैं।
जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता उसके जन्म, लिंग और शरीर के आधार पर तय की जाती है, तो वह केवल परंपरा नहीं, बल्कि असमान शक्ति-संबंधों का प्रश्न बन जाता है।
3. व्रत, उपवास और त्याग का असमान बोझ
करवा चौथ, तीज और अन्य व्रत अनेक महिलाओं के लिए आस्था, प्रेम और सांस्कृतिक जुड़ाव के प्रतीक हैं। किसी महिला का स्वेच्छा से व्रत रखना अपने आप में शोषण नहीं है।
समस्या तब पैदा होती है, जब व्रत को पत्नी के कर्तव्य और अच्छे चरित्र की कसौटी बना दिया जाता है। जब व्रत न रखने वाली महिला को बुरी पत्नी कहा जाता है या उसके कारण पति के साथ अनिष्ट होने का भय दिखाया जाता है, तब आस्था पर सामाजिक दबाव हावी होने लगता है।
यदि पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे की लंबी उम्र और स्वास्थ्य की कामना करते हैं, तो त्याग और जिम्मेदारी भी दोनों की समान होनी चाहिए।
प्रेम का प्रमाण किसी एक व्यक्ति का भूखा रहना नहीं, बल्कि दोनों का एक-दूसरे के सुख, स्वास्थ्य और सम्मान का ध्यान रखना है।
4. भय और अपराधबोध का मनोविज्ञान
धार्मिक मान्यताओं का इस्तेमाल कभी-कभी महिलाओं में भय और अपराधबोध पैदा करने के लिए किया जाता है।
उन्हें बताया जा सकता है कि किसी विशेष कर्मकांड को न करने से परिवार पर संकट आ जाएगा, पति का अनिष्ट होगा या संतान का भविष्य खराब हो जाएगा।
ऐसी धारणाएँ महिलाओं को अपनी आवश्यकताओं से ऊपर दूसरों की अपेक्षाओं को रखने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।
विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए इसका विरोध करना कठिन हो सकता है, जो आर्थिक रूप से परिवार पर निर्भर हैं या सामाजिक बहिष्कार का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि हर धार्मिक आचरण स्वतंत्र इच्छा का परिणाम नहीं होता; कभी-कभी उसके पीछे सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और बचपन से विकसित भय भी काम करते हैं।
5. महिलाओं के शोषण से किसे लाभ मिलता है?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है।
जब महिलाओं को यह विश्वास दिलाया जाता है कि परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखना, पति की सेवा करना और परंपराओं का पालन करना ही उनका सर्वोच्च धर्म है, तो मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने की संभावना कम हो सकती है।
इस व्यवस्था से उन लोगों को लाभ मिल सकता है, जो परिवार और समाज में अपने विशेषाधिकार बनाए रखना चाहते हैं।
धार्मिक कर्मकांडों से जुड़े आर्थिक हित भी कुछ परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भय और संकट का लाभ उठाकर धार्मिक सेवाएँ बेचने वाले लोग लोगों की असुरक्षा को भुना सकते हैं।
हालाँकि, यह मान लेना उचित नहीं होगा कि हर धार्मिक व्यक्ति या संस्था महिलाओं का शोषण करने के उद्देश्य से काम करती है। धार्मिक समुदायों के भीतर भी महिलाओं की गरिमा, शिक्षा और समानता के लिए संघर्ष करने वाले लोग मौजूद हैं।
वास्तविक प्रश्न यह है कि किसी परंपरा से किसे अधिकार मिलता है, किस पर जिम्मेदारी डाली जाती है और उस परंपरा पर सवाल उठाने की स्वतंत्रता किसके पास है?
6. महिलाएँ ही इन परंपराओं को आगे क्यों बढ़ाती हैं?
एक विरोधाभास यह भी है कि कई बार महिलाएँ स्वयं उन परंपराओं की रक्षक बन जाती हैं, जिनसे दूसरी महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित होती है।
इसका कारण केवल अज्ञान नहीं है।
बचपन से धार्मिक मान्यताओं को सही और गलत का अंतिम पैमाना मानने, सामाजिक स्वीकृति पाने, परिवार में सम्मान बनाए रखने और अपनी भूमिका को सार्थक समझने की इच्छा के कारण महिलाएँ भी इन परंपराओं को आगे बढ़ा सकती हैं।
कई महिलाएँ इन परंपराओं में प्रेम, सुरक्षा, सामुदायिक पहचान और भावनात्मक संतोष भी अनुभव करती हैं।
इसलिए समाधान महिलाओं की आस्था का अपमान करना नहीं, बल्कि उन्हें यह स्वतंत्रता देना है कि वे अपनी मान्यताओं की समीक्षा कर सकें और बिना भय के अपने निर्णय ले सकें।
एक महिला यदि अपनी इच्छा से व्रत रखती है, तो उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन यदि वही व्रत उसके लिए अनिवार्य बना दिया जाए, तो उस बाध्यता पर सवाल उठाना भी उतना ही आवश्यक है।
7. समाधान धर्म का अपमान नहीं, समानता की स्थापना है
महिलाओं को धार्मिक और सामाजिक शोषण से मुक्त करने के लिए कुछ बुनियादी बदलाव आवश्यक हैं।
शिक्षा:-- महिलाओं को धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक परंपराओं और अपने संवैधानिक अधिकारों पर स्वतंत्र रूप से विचार करने का अवसर मिले।
आर्थिक स्वतंत्रता:-- महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता उन्हें अन्यायपूर्ण दबावों का विरोध करने की शक्ति देती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-- किसी मान्यता को केवल प्राचीन या पवित्र होने के कारण सही न मानकर तर्क और प्रमाण की कसौटी पर परखना चाहिए।
समान जिम्मेदारी:-- परिवार, विवाह, संतान और सामाजिक जीवन से जुड़े कर्तव्यों में पुरुषों और महिलाओं की समान भागीदारी हो।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता:-- किसी महिला को धार्मिक परंपरा अपनाने या छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
सामाजिक सुधार:-- धार्मिक समुदायों के भीतर मौजूद उन आवाजों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जो भेदभाव और लैंगिक असमानता को चुनौती देती हैं।
निष्कर्ष:-- आस्था निजी हो सकती है, लेकिन असमानता सामाजिक प्रश्न है
धर्म की शिकार सबसे ज्यादा महिलाएँ क्यों होती हैं - इसका उत्तर केवल धर्म में खोजने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी।
इसके लिए पितृसत्ता, सामाजिक संरचना, आर्थिक निर्भरता, शिक्षा की असमानता और धार्मिक मान्यताओं की व्याख्या करने वाली सत्ता को भी समझना होगा।
जब किसी समाज में महिलाओं के त्याग को महानता और पुरुषों के अधिकारों को स्वाभाविक माना जाता है, तब असमानता केवल कानूनों में नहीं, बल्कि लोगों की मानसिकता में भी जड़ें जमा लेती है।
यह भी सच है कि धर्म ने अनेक महिलाओं को सामुदायिक शक्ति, भावनात्मक सहारा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा दी है। इसलिए सभी धार्मिक अनुभवों को एक ही नजरिए से देखना उचित नहीं होगा।
लेकिन किसी भी परंपरा को केवल इसलिए अन्याय से मुक्त नहीं माना जा सकता कि वह सदियों से चली आ रही है।
यदि किसी धार्मिक मान्यता के पालन में पुरुष को स्वतंत्रता और महिला को बाध्यता मिले, पुरुष को अधिकार और महिला को त्याग करना पड़े, तो उस मान्यता की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।
समाज की प्रगति इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसकी महिलाएँ कितने व्रत रखती हैं, कितने कर्मकांड करती हैं या कितनी परंपराओं का पालन करती हैं।
प्रगति इस बात से मापी जानी चाहिए कि उन्हें अपने जीवन के फैसले लेने की कितनी स्वतंत्रता, समानता और गरिमा प्राप्त है।
क्योंकि जिस समाज में महिला की स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण परंपरा हो जाए, वहाँ परंपरा की रक्षा तो हो सकती है, लेकिन महिला की समानता और गरिमा खतरे में पड़ सकती है।
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વિશ્વગુરુ બનવા બદલ અભિનંદન
વિશ્વ માં ચોથા નંબરની સૌથી મોટી ઇકોનોમી ધરાવતું વિશ્વગુરુ ભારત
@RuchiraTripathi @_Sweet_Parul_ @ansari2487
➥ मतदाता सूची से नाम कटे तो सिर्फ़ वोट नहीं, लोकतंत्र पर जनता का भरोसा भी कटता है। 🗳️⚠️
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🔥💀 मोदी सरकार और चुनाव आयोग से सीधे सवाल —
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╭┈➤ चुनाव आयोग की नियुक्ति में सरकार का बहुमत क्यों ज़रूरी है?
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⬩➤ मतदाता सूची से बाहर हुए नागरिकों को समय पर न्याय कब मिलेगा?
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⬩➤ हर निर्णय और आपत्ति का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों न हो?
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╰┈➤ˎˊ˗ आयोग की निष्पक्षता को जनता के सामने पारदर्शी ढंग से कैसे साबित किया जाएगा?
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🔥 लोकतंत्र में सिर्फ़ वोट गिनना काफ़ी नहीं।
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╭┈➤ चुनाव आयोग सरकार का नहीं, संविधान का है।
╰┈➤ˎˊ˗ और संविधान के सामने हर सत्ता को जवाब देना होगा। 🇮🇳⚖️
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➥ BJP और चुनाव आयोग के रिश्ते पर सवाल हवा में नहीं उठ रहे — इनके पीछे फैसलों की पूरी कड़ी है।
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UP है भईया...
जहाँ JCB देखने के लिए सैकड़ों लोग खड़े हो जाते हैँ वहाँ Air show दिखाओगे तो लाखों लोग आयेंगे हीं..!!😂
मैने ख़ुद को बड़ी मुश्किल से रोका 🤣😂




























