मोदी के खिलाफ तीखी और विवादित क्यों करते हैं खड़गे?
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पटना में श्रीकृष्ण सिंह जयंती समारोह के मौके पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पीएम मोदी के खिलाफ तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, मोदी का बाप भी जाएगा। इस टिप्पणी के बाद ऐसा लगा कि बीजेपी इसे अपने पक्ष में भुनाने की भरपूर कोशिश करेगी जिससे उसे मौजूदा परीक्षा, युवा और चुनाव संबंधी विवादों के झमेले से छुटकारा मिल सके। यह बीजेपी का जांचा परखा दाव रहा है, मोदी के खिलाफ हर विवादास्पद टिप्पणी को वे अपने पक्ष में भावनात्मक माहौल बनाने में इस्तेमाल कर लेते हैं। इस बार भी पटना में बीजेपी नेता सड़कों पर उतरे मगर दिखा कि लगातार सत्ता की आदत ने उन्हें लड़ने भिड़ने के मामले में कमजोर कर दिया है। लोग कम आए, प्रतीकात्मक विरोध हुआ और माहौल बना नहीं।
यह भारत की राजनीति का एक पॉपुलर मुहावरा बन गया है कि अपनी तरफ फेंके गए पत्थरों को अपना हथियार बनाने में मोदी उस्ताद हैं। फिर चाहे गुजरात चुनाव में उन्हें सोनिया गांधी ने मौत का सौदागर कहा हो या 2014 के चुनाव के वक्त मणिशंकर अय्यर ने उन्हें नींच कहा। दोनों बातों का उन्होंने भरपूर फायदा उठाया। मगर अब सत्ता के तीसरे टर्म के आसपास वह मामला घिसने लगा है, इसलिए खड़गे लगातार बेहिचक मोदी पर तीखे हमले करते हैं। यह उनका पहला हमला नहीं है।
उदाहरणों से समझें
इसी साल अप्रैल महीने में खड़गे ने मोदी को तमिलनाडु चुनाव के पहले 'आतंकवादी' कहा। बीजेपी मामले को चुनाव आयोग में तो ले गई, मगर कांग्रेस को इस बयान का कोई नुकसान या बीजेपी को कोई फायदा नहीं हुआ।
मई, 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान खड़गे ने हरियाणा में मोदी को 'झूठो का सरदार' कहा। बीजेपी ने इसे चुनाव में लाभ उठाने का मौका समझा। मगर पार्टी 240 सीटों पर अटक गई।
अप्रैल, 2023 कर्नाटक विधानसभा चुनाव में खड़गे ने मोदी को 'जहरीला सांप' कहा था। मुद्दा खूब उछला। बीजेपी ने परसेप्शन बनाने की कोशिश की। मगर कांग्रेस को अच्छी जीत मिली।
नवंबर, 2022 में खड़गे ने गुजरात चुनाव में मोदी की तुलना रावण से की थी। गुजरात चुनाव बीजेपी जीतती रही है। ऐसा नहीं कह सकते कि खड़गे के इस बयान से बीजेपी को कोई खास लाभ मिला।
इसलिए ऐसा लगता है कि अपने ऊपर फेंके गए पत्थर को हथियार बनाने का मोदी और बीजेपी का कौशल अब चूकने लगा है और खड़गे इस बात को समझ गए हैं।
बाकी यह कौशल बीजेपी को प्रशांत किशोर ने सिखाया था, अब उनसे पूछना चाहिए कि यह दांव अब क्यों काम नहीं कर रहा!
यात्रा करो, मगर किसी को बताओ नहीं
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आपने यह स्लोगन इन दिनों खूब सुना होगा। मोबाइल और सेल्फी के युग में इंसान आज अपने हर अनुभव को तस्वीरों और वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर डाल देता है। हर टूरिस्ट प्लेस पर लोग मोबाइल उठाए वीडियो बनाते नजर आते हैं, देखते कम हैं, दिखाते अधिक। ऐसे में यह सूक्ति वाक्य अब कहा जाता है कि यात्रा कुछ इस तरह कीजिए कि उसका ढिंढोरा पीटने की जरूरत न हो।
आज एक रेल यात्रा में ऐसे ही एक दंपति मिले। महाराष्ट्र के कल्याण के नारायण (75 साल) और उषा (70 साल) जो हिमालय की 15 हजार फुट ऊंची चढ़ाई करके लौट रहे थे। यह दंपति लगभग पिछले पचास साल से यात्रा कर रहा है। जब नौकरी चाकरी और घर परिवार के चक्कर थे तो साल में दो या तीन यात्राएँ करता था, अब हर दो महीने में एक ट्रिप।
इन्होंने लगभग पूरा देश घूम लिया है। इनके किस्सों में एलेप्पी से लेकर हिमालय तक के किस्से हैं। महाराष्ट्र के आदिवासी गांवों की कहानियां हैं। मगर कोई बड़ा टूरिस्ट स्पॉट नहीं। ज्यादातर अल्पज्ञात टूरिस्ट स्टेशन। जिनके बारे में कम लोगों को पता है। जहां भीड़ कम होती है। जहां पहुंचना मुश्किल है। जहां सड़क नहीं जाती। जहां ठहरने के लिए होटल कम हैं।
अपने बैग पैक में पोर्टेबल स्टोव, चावल, दाल और टेंट लेकर चलने वाला यह दम्पति बाहर का खाना पंसद नहीं करता। चाय से लेकर खिचड़ी तक खुद पकाता है। गांवों में किसी के घर ठहर जाता है और उन्हें इसका किराया देता है। ऊषा बताती हैं कि आदिवासी बस्तियों में आज भी लोग 150 रुपए में खाना खिला देते हैं। रहने की जगह मिल जाती है। नारायण बताते हैं कि उन्होंने कई बार स्टेशन पर रात गुजारी है। ज्यादातर यात्राएं ट्रेन से की हैं, पहले स्लीपर क्लास में जाते थे और अब थर्ड एसी या इकॉनमी क्लास। घूमते हैं, मगर पैसे नहीं उड़ाते। कम खर्च में घूमने की कला विकसित की है।
इस उम्र में जहां ज्यादातर बुजुर्गों की रुचि तीर्थाटन की तरफ हो गई है, इसकी प्राथमिकता अभी भी प्रकृति और गुमनाम इलाकों की तलाश है। भारत में ही घूमते हैं, विदेश भ्रमण की ललक नहीं है। आजकल हिमालय उनकी प्राथमिकता में है। बहुत सहज लोग हैं। मुश्किल से खुलते हैं मगर एक बार आदमी जम जाए तो सारे अनुभव बताते हैं।
मैंने पूछा, आप अपने अनुभव लिखते नहीं। तो कहा 2000 से पहले डायरी में लिखता था, अब बंद कर दिया। न यात्रा वृत्तांत लिखते, न सोशल मीडिया पोस्ट करते। बस घूमते हैं और खुश होते हैं। सफ़र का और नज़ारों का अपनी आंखों से आनंद लेते हैं।
मैंने बहुत झिझकते हुए कहा कि आप दोनों की तस्वीर ले लूं। नारायण ने तो मना कर दिया मगर उषा तैयार हो गईं। फिर बात बन गई।
यात्रा करो, मगर किसी को बताओ नहीं
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आपने यह स्लोगन इन दिनों खूब सुना होगा। मोबाइल और सेल्फी के युग में इंसान आज अपने हर अनुभव को तस्वीरों और वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर डाल देता है। हर टूरिस्ट प्लेस पर लोग मोबाइल उठाए वीडियो बनाते नजर आते हैं, देखते कम हैं, दिखाते अधिक। ऐसे में यह सूक्ति वाक्य अब कहा जाता है कि यात्रा कुछ इस तरह कीजिए कि उसका ढिंढोरा पीटने की जरूरत न हो।
आज एक रेल यात्रा में ऐसे ही एक दंपति मिले। महाराष्ट्र के कल्याण के नारायण (75 साल) और उषा (70 साल) जो हिमालय की 15 हजार फुट ऊंची चढ़ाई करके लौट रहे थे। यह दंपति लगभग पिछले पचास साल से यात्रा कर रहा है। जब नौकरी चाकरी और घर परिवार के चक्कर थे तो साल में दो या तीन यात्राएँ करता था, अब हर दो महीने में एक ट्रिप।
इन्होंने लगभग पूरा देश घूम लिया है। इनके किस्सों में एलेप्पी से लेकर हिमालय तक के किस्से हैं। महाराष्ट्र के आदिवासी गांवों की कहानियां हैं। मगर कोई बड़ा टूरिस्ट स्पॉट नहीं। ज्यादातर अल्पज्ञात टूरिस्ट स्टेशन। जिनके बारे में कम लोगों को पता है। जहां भीड़ कम होती है। जहां पहुंचना मुश्किल है। जहां सड़क नहीं जाती। जहां ठहरने के लिए होटल कम हैं।
अपने बैग पैक में पोर्टेबल स्टोव, चावल, दाल और टेंट लेकर चलने वाला यह दम्पति बाहर का खाना पंसद नहीं करता। चाय से लेकर खिचड़ी तक खुद पकाता है। गांवों में किसी के घर ठहर जाता है और उन्हें इसका किराया देता है। ऊषा बताती हैं कि आदिवासी बस्तियों में आज भी लोग 150 रुपए में खाना खिला देते हैं। रहने की जगह मिल जाती है। नारायण बताते हैं कि उन्होंने कई बार स्टेशन पर रात गुजारी है। ज्यादातर यात्राएं ट्रेन से की हैं, पहले स्लीपर क्लास में जाते थे और अब थर्ड एसी या इकॉनमी क्लास। घूमते हैं, मगर पैसे नहीं उड़ाते। कम खर्च में घूमने की कला विकसित की है।
इस उम्र में जहां ज्यादातर बुजुर्गों की रुचि तीर्थाटन की तरफ हो गई है, इसकी प्राथमिकता अभी भी प्रकृति और गुमनाम इलाकों की तलाश है। भारत में ही घूमते हैं, विदेश भ्रमण की ललक नहीं है। आजकल हिमालय उनकी प्राथमिकता में है। बहुत सहज लोग हैं। मुश्किल से खुलते हैं मगर एक बार आदमी जम जाए तो सारे अनुभव बताते हैं।
मैंने पूछा, आप अपने अनुभव लिखते नहीं। तो कहा 2000 से पहले डायरी में लिखता था, अब बंद कर दिया। न यात्रा वृत्तांत लिखते, न सोशल मीडिया पोस्ट करते। बस घूमते हैं और खुश होते हैं। सफ़र का और नज़ारों का अपनी आंखों से आनंद लेते हैं।
मैंने बहुत झिझकते हुए कहा कि आप दोनों की तस्वीर ले लूं। नारायण ने तो मना कर दिया मगर उषा तैयार हो गईं। फिर बात बन गई।
पिछले 21-22 साल से सक्रिय राजनीति में रहे अनंत सिंह को उनके राजनीतिक जीवन में पहली बार किसी पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखाया है।
वह भी इस आरोप में कि उन्होंने जेडीयू के शीर्ष नेताओं के खिलाफ अपमानजक टिप्पणियां की और चुनाव में विरोधी उम्मीदवार की मदद की। यानी पार्टी विरोधी गतिविधि में।
उन्हें कभी उनके आपराधिक मामलों की वजह से किसी पार्टी ने बाहर का रास्ता नहीं दिखाया। जबकि लगभग हर दौर में उनपर दो दर्जन से अधिक आपराधिक मुकदमे रहे, कुछ गंभीर किस्म के आरोप भी रहे। बीते विधानसभा चुनाव में तो उन पर हत्या का गंभीर आरोप था, मगर पार्टी ने उनकी भरपूर मदद की।
नीतीश कुमार तो हमेशा अनंत सिंह के प्रति नरम रहे। अब तमाम सुचिता के दावों के बावजूद।
जदयू ही नहीं राजद भी उन्हें अपने यहां जगह देने में बाहें पसारे दिखता है। इस बार तो जनसुराज को भी अनंत सिंह की मदद लेने से गुरेज नहीं रहा।
यह हमारे देश की राजनीति की विचित्र विडंबना है। यहां हत्या से बड़ा अपराध पार्टी विरोधी गतिविधि है।
भारत में ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों में पिछले चार हजार साल से सिंह के साथ दिखाई देने वाली ऐसी कई शक्ति की देवियों की पूजा होती रही है?
वे हथियारों से लैस हैं. वे युद्ध करती हैं, शत्रुओं का संहार करती हैं. हमारे यहां भारत माता की कल्पना भी कभी अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली देवी के रूप में की गई.
देवी की यह शक्तिशाली छवि समाज की कल्पना में तो मौजूद है, मगर जब कोई वास्तविक स्त्री अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरती है, सत्ता से सवाल पूछती है और अपने संघर्ष का नेतृत्व करती है, तो समाज का एक हिस्सा आज भी सहज नहीं रह पाता.
मिथकों से इतिहास तक और वहां से आज की आंदोलनकारी युवतियों तक, इसी सवाल की पड़ताल करते हुए मैंने यह आलेख लिखा है. इस लिंक पर पढ़ सकते हैं—
biharchronicle.com/from-godd…
बिहार में अवैध वेतन निकासी के नाम पर एक बड़े घोटाले की आहट है। इस घोटाले ने राज्य की वेतन भुगतान समस्या पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरे राज्य से वेतन से अधिक भुगतान, दोहरे भुगतान, कई गुना अधिक HRA के भुगतान की शिकायतें मिल रही हैं। भले इसकी चर्चा कम हो रही है, मगर सरकार में इसको लेकर अफरा तफरी का माहौल है।
राज्य में शिक्षा विभाग और गृह विभाग के 10.30 लाख कर्मियों का वेतन रोककर एक एक कर्मी के कागजात मिलाए जा रहे हैं। जगह जगह से मामले सामने आ रहे हैं।
क्या है यह पूरा मामला? डाटा एंट्री ऑपरेटरों ने कर्मियों और अफसरों से मिलकर कैसे दिया इसे अंजाम? सरकार किन बिंदुओं पर जांच करा रही है? क्या जांच पर्याप्त है? क्यों हमारे वेतन भुगतान का डिजिटल सिस्टम भी लीक प्रूफ नहीं है? इन तमाम मसलों पर एक विस्तृत रिपोर्ट Bihar Chronicle के लिए लिखी है। पढ़े और ठीक लगे तो आगे बढ़ाएं।
रिपोर्ट का लिंक biharchronicle.com/signs-of-…
व्यूज की भूख - वह मदद करने आई थी, उसे रशियन दुल्हनिया बना दिया
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पहले इस वीडियो को देखें। यह उसी महिला और उसके साथियों का वीडियो है जिसे कल तक रशियन दुल्हनिया बताया जा रहा था। जबकि वह अपनी संस्था shivia के साथ बिहार की महिलाओं की आजीविका से जुड़ी मदद करने आई थी।
अब उस पूरे मामले की कहानी इस लिंक पर पढ़ें
biharchronicle.com/a-hunger-…
pushyamitra retweeted
Replying to @pushymitr
@pushymitr जी की यह रिपोर्ट बेहद चिंताजनक है !भारत सरकार, गुजरात सरकार और बिहार सरकार को अविलंब श्रमिकों, श्रमिक संगठनों और मिल मालिकों के बीच अविलंब मध्यस्ता कर समाधान निकालना चाहिए!
सूरत में प्रवासी मजदूरों का 'गांव चलो अभियान': आठ घंटे की शिफ्ट और साप्ताहिक छुट्टी की मांग पर अडिग hindi.downtoearth.org.in/eco… – at Saharsa, India
सूरत में आठ घंटे की शिफ्ट और साप्ताहिक अवकाश की लड़ाई लड़ रहे मजदूरों ने आज जिला कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन करने का फैसला किया है।
अब तक इस मामले में क्या अपडेट हैं, उसे समझने के लिए इन्हें देख सकते हैं
राघोपुर नाव हादसे में हुई 13 लोगों की मौत लापरवाहियों की मिसाल है. सरकार और समाज दोनों की लापरवाहियां. न लोगों में अपनी सुरक्षा की फिकर है, न सरकार जिसकी जिम्मेदारी नौवहन को सुरक्षित बनाना है, इन मामलों को लेकर गंभीर होती है. हर हादसे के बाद नावों के निबंधन, सुरक्षा इंतजाम, लाइफ जैकेट वगैरह के आदेश जारी होते हैं, मगर कुछ दिन बाद सरकार ही अपने उन आदेशों को भूल जाती है.
बिहार में 1,550 नौका घाट और 7,000 से ज्यादा नावें रोजाना चलती हैं. उन पर सवार लाखों यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
बिहार क्रोनिकल पर इन्हीं मसलों को लेकर लिखा है- लिंक
biharchronicle.com/who-will-…
पिछले दो महीने से बिहारी मजदूर सूरत में काम के घंटों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इस बीच दो दिन से केंद्रीय कपड़ा मंत्री Giriraj Singh भी सूरत में हैं।
मगर सूरत में उनकी लगभग सभी मुलाकातें करोबारियों और उद्यमियों के साथ हुई, उन्होंने एक बार भी आंदोलनकारियों से मिलना जरूरी नहीं समझा, बस बयान जारी किए।
अगर उन्होंने कोई मुलाकात की होती तो उसकी तस्वीर उनके सोशल मीडिया वाल पर होती। अभी जो तसवीरें हैं, वे यही हैं।
जब पूरा देश दिल्ली के CJP आंदोलन की तरफ देख रहा है, सूरत में बिहारी मजदूर अपने हक के लिए लड़ रहे हैं.
12 घंटे की ड्यूटी से मुक्ति, 8 घंटे की शिफ्ट और हफ्ते में एक दिन सवेतन छुट्टी की मांग. मालिकों की भी हैं अपनी शर्तें. अब आंदोलन पहुंचा है ‘गांव चलो’ तक.
क्या अपने हक के लिए सूरत छोड़कर गांव लौटेंगे मजदूर? क्या उन्हें मिलेगी 8 घंटे की शिफ्ट?
पढ़िए बिहार क्रॉनिकल की खास रिपोर्ट इस लिंक पर
biharchronicle.com/will-the-…
कल के CJP आंदोलन और पुलिस की सख्ती के मसले पर दो AI प्लेटफार्म ChatGPT और Google Gemini की क्या राय है देखें -
CJP आंदोलन और सरकारी सख्ती पर क्या कहता है AI?
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क्या CJP का आंदोलन अन्ना आंदोलन या जेपी आंदोलन जैसा है? सरकार की सख्ती और आज के दमन की तुलना इमरजेंसी से की जा सकती है? और क्या भारत में भी नेपाल-बांग्लादेश जैसे हालात पैदा होने का खतरा है?
इन सवालों पर ChatGPT और Google Gemini की राय क्या है? दोनों AI के जवाबों में कई दिलचस्प समानताएं हैं, तो कुछ अहम फर्क भी।
पढ़िए, एक आंदोलन, चार सवाल और AI का विश्लेषण।
biharchronicle.com/the-cjp-m…
मक्खी मारने का हथौड़ा
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1. देश भर की 200 से अधिक ट्रेनें रद्द या री-शेड्यूल
2. दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशन बंद
3. देश भर में छात्रों की धड़पकड़
5. जंतर मंतर के चार किमी के दायरे में जबरदस्त नाकेबंदी
6. 25 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती
वजह - कॉकरोच जनता पार्टी की अपील पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई प्रदर्शन न हो पाए।
वैसे सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है - मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।
मैंने देखा था नमक हलाल फिल्म में अमिताभ बच्चन को तलवार से मक्खी उड़ाते हुए। कई मेहमानों की नाक कट गई थी।
हां, मक्खियों को सत्ता की नाक पर बैठने की आदत लग गई है। सत्ता नाक बचाने में परेशान है।
पुलिस के डर से दर्जनों लोग पुनपुन नदी में कूद गए। दो की मौत हो गई।
अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई के बीच आखिर ऐसा क्या हुआ कि लोगों ने पुलिस से बचने के लिए नदी को रास्ता चुना?
क्या बेहरावां चकिया में पुलिस कार्रवाई ने अपनी हदें तोड़ दी थी?
चार दिन बाद गांव पहुंचकर की गई पूरी पड़ताल पढ़िए इस लिंक पर
biharchronicle.com/two-death…
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India और Pakistan कभी दोस्त क्यों नहीं बन सकते हैं? Senior Journalist Pushyamitra | Padhaku Nitin
Full Ep - youtu.be/Rll5_xzJyHU
@thenitinnotes @pushymitr
#Gandhi #MahatmaGandhi #Jinnah #MuhammadAliJinnah #IndiaPakistan #IndiaPakistanRelations
विधान परिषद का एलीट क्लब: दलित, अति पिछड़े और स्त्रियों के लिए दरवाजा कितना खुला?
बिहार विधान परिषद की आठ खास सीटों पर 23 अक्तूबर को चुनाव होने जा रहा है। चार सीटें स्नातकों के लिए हैं और चार शिक्षकों के लिए। मतदाता भी खास हैं, चुनाव का गणित भी।
लेकिन पिछले करीब ढाई दशक के रिकॉर्ड को देखें तो एक सवाल परेशान करता है—इस श्रेणी की 12 सीटों से निर्वाचित प्रतिनिधियों में महिलाएं और दलित कहां हैं? अति पिछड़ों की मौजूदगी कितनी है?
इस चुनाव में करीब 4.85 लाख स्नातक और 45,660 शिक्षक अपने प्रतिनिधि चुनेंगे। लेकिन राज्य में 80 लाख से अधिक स्नातक और करीब 7 लाख सरकारी शिक्षक होने के बावजूद इस खास मतदाता सूची तक पहुंचने वालों की संख्या इतनी कम क्यों है?
क्या यह व्यवस्था सचमुच विशेषज्ञता और विशेष प्रतिनिधित्व को जगह देती है, या शिक्षा, सामाजिक स्थिति और राजनीतिक सक्रियता की असमानता कुछ समूहों को स्वाभाविक बढ़त देती है?
बिहार विधान परिषद के इस ‘खास चुनाव’ की सामाजिक तस्वीर को समझने की कोशिश करती यह पड़ताल।
इस लिंक पर
biharchronicle.com/the-legis…
चेतावनी फाइलों में दबी रही, तटबंध पानी में बह गए: बिहार की बाढ़ क्या सिर्फ कुदरत का कहर है?
सारण के मकेर में तटबंध टूटने के बाद जब जल संसाधन विभाग के इंजीनियर मौके पर पहुंचे, तो आक्रोशित ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हो गए. वीडियो वायरल हुआ, चर्चा इंजीनियरों से बदसलूकी और फिर उनके निलंबन तक सिमट गई.
लेकिन इस हंगामे के पीछे के सरकारी दस्तावेज कुछ और ही कहानी बयां करते हैं:
* करोड़ों का बजट, फिर भी धसान: मकेर तटबंध के जिस हिस्से की मरम्मत 20 करोड़ से अधिक की राशि से हुई थी, वह पानी का दबाव नहीं झेल सका।
* चेतावनी के बावजूद ‘वेट एंड वाच’: इस साल टूटे 15 तटबंधों में से 9 के बारे में विभाग को पिछले साल नवंबर से ही खतरे की आशंका थी. 4 जगहों पर काम होने के बाद भी तटबंध टूटे, और 5 संवेदनशील स्थलों को सिर्फ 'निगरानी' में रखकर छोड़ दिया गया.
* अकेला मकेर नहीं: खैरटवा, पानापुर, नवगछिया से लेकर पटना और नालंदा तक—24 जगहों पर तटबंधों का टूटना महज इत्तेफाक नहीं लगता.
जब संवेदनशील स्थलों की सूची पहले से मेज पर थी, तो यह विफलता किसकी है? असली जिम्मेदारी फील्ड के इंजीनियरों की ही है जिन्हें निलंबित कर दिया गया, या विभाग के सीनियर अधिकारी से भी चूक हुई? उन्हें कब मिलेगी सजा?
पूरी पड़ताल पढ़ें नीचे दिए गए लिंक पर 👇
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#BiharFloods #Saran #WaterResourcesDepartment #GroundReport #BiharNews #Biharchronicle
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ये नाव गन्ने और धान के खेतों से गुजर रही है, धान की फसल तो बची नहीं, गन्ने के भी बचने की सूरत नहीं हैं क्योंकि 3 महीने से ज्यादा हो गया है पश्चिमी चंपारण के इन गांवों में बाढ़ को..
@pushymitr की ग्राउंड रिपोर्ट
#BiharFlood पर Ground Report- youtu.be/EUC-XZpxC5o?si=ek2Y…


























