असमानता को मानने वाले क्षेष्ठ नहीं हो सकते,
राम क्षत्रिय, कृष्ण क्षत्रिय, बुद्ध क्षत्रिय, महावीर क्षत्रिय!
आखिर क्षत्रिय कुल में ऐसा कौन-सा विशेष गुण था ?
क्या किसी शूद्र का जन्म महानता, ज्ञान, तपस्या और नैतिक नेतृत्व के लिए पर्याप्त नहीं था?
बाबा साहेब ने इस पर सख्त टिप्पणी की है।
यदि ईश्वर जाति से परे है, तो ईश्वर के मानवीय अवतारों की कहानियाँ जन्म और वंश से इतनी प्रभावित क्यों हैं?
रामराज्य की उस तस्वीर पर आइए, जिसे सदियों से आदर्श शासन बताकर प्रस्तुत किया जाता रहा है।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में शंबूक नामक शूद्र तपस्वी का प्रसंग आता है।
शंबूक तपस्या करता है। राम उसका वध करते हैं।
क्यों?
क्योंकि कथा के अनुसार शूद्र द्वारा उस प्रकार की तपस्या करना वर्णव्यवस्था का उल्लंघन था।
यह प्रसंग मूल रामायण का हिस्सा था या बाद में जोड़ा गया, इस पर विद्वानों में विवाद है।
लेकिन सवाल फिर भी बना रहता है—जिस धार्मिक साहित्य में शूद्र की तपस्या को सामाजिक व्यवस्था के लिए संकट बताया गया, वह किस प्रकार के समाज को वैधता प्रदान कर रहा था?
कुछ जातिगत प्रिविलेज वाले लोग कहते हैं वाल्मीकि रामायण में ये उल्लेखित नहीं है;
अरे भाई सवाल आपसे यही है कि कौनसी रामायण माने ये निर्णय कौन करेगा? तुम निर्णय करने वाले कौन हो? तुम अपनी सुविधा के अनुसार चीजों को काटते छांटते हो। उत्तर कांड क्या मैंने लिखा है? उत्तर कांड क्या माना नहीं जाता? बोलते हैं कि ये मूल रामायण का हिस्सा नहीं है, तो भाई ये किसी भी रामायण का हिस्सा हो, ये सामाजिक व्यवस्था की स्थिति को तो नहीं बदलता न? ये शूद्रों को कैसे स्वीकार होगा?
दूसरी ओर सीता हैं।
रावण के अपहरण की पीड़िता सीता को अपनी पवित्रता सिद्ध करनी पड़ती है। उत्तरकांड में गर्भवती सीता का परित्याग होता है।
आखिर यह किस प्रकार का आदर्श समाज है, जहाँ राजा की प्रतिष्ठा बचाने के लिए स्त्री को अपनी गरिमा और अधिकारों की कीमत चुकानी पड़ती है?
बाबासाहेब आंबेडकर ने भी इन्हीं विरोधाभासों पर प्रहार किया था।
अपनी पुस्तक Riddles in Hinduism में उन्होंने राम और कृष्ण के चरित्रों को आलोचनात्मक विवेचना के दायरे में रखा।
यही ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना का मूल प्रश्न है।
जिस समाज में जन्म से श्रेष्ठता निर्धारित हो, उसमें समानता कैसे संभव होगी?
जिस समाज में ज्ञान पर कुछ वर्णों का विशेषाधिकार हो, उसमें बौद्धिक स्वतंत्रता कैसे आएगी?
सिर्फ ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें करने से कोई समाज प्रगति नहीं करता। हमरा समाज जाति के बंधन में कुछ विशेष जातियों ने जकड़ रखा है, और यही जातियां सामाजिक सुधार में अड़ंगे लगाती रही हैं।
जिस समाज में धर्मग्रंथों को आलोचना से ऊपर रख दिया जाए, वहाँ सामाजिक सुधार कैसे होगा?
अब एक और प्रश्न।
राम त्रेतायुग में हुए बताए जाते हैं। कृष्ण द्वापरयुग में।
लेकिन इन युगों की पारंपरिक लाखों वर्षों वाली कालगणना का स्वतंत्र ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण कहाँ है?
धार्मिक आस्था किसी कथा को पवित्र मान सकती है, लेकिन आस्था अपने-आप में इतिहास का प्रमाण नहीं बन जाती।
समस्या तब शुरू होती है जब किसी धार्मिक कथा की एक विशेष व्याख्या को अंतिम सत्य घोषित करके जातिगत पदानुक्रम, पितृसत्ता या राजनीतिक वर्चस्व को वैधता दी जाती है।
मेरा सवाल किसी व्यक्ति की आस्था से नहीं, सत्ता-संरचना से है;
अगर रामराज्य आदर्श है, तो शंबूक पर बहस क्यों नहीं? अपनी सुविधा के अनुसार वाल्मीकि रामायण को बढ़ाना है, उसमें भी काट छांट करना है, शूद्रों की स्थिति को छुपा देना है, ये कौनसी सुविधा की राजनीति है? तुम खुद कौन होते हो निर्णय करने वाले की धर्म भी मानो और फिर उसको अपने अनुसार ही तोड़ो और मरोड़ो।
अगर राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, तो सीता के अधिकारों पर प्रश्न क्यों नहीं?
अगर धर्म सबके लिए है, तो जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता का विचार क्यों? लगभग सभी भारतीय भगवान क्षत्रिय ही क्यों है? ये वैधता किसने दी? कौनसा समाज का हिस्सा है जो इसको संस्थान का दर्जा देकर संरक्षण देता आया है?
ऐसी रामायण से किसका भला हो रहा है?
और अब आज के समय में ऐसी कांटी छांटी गई रामायण से किसका प्रिविलेज सुरक्षित किया जा रहा है?
और ऐसे प्रोपगेंडा की रामायण से कितने दिनों तक इतिहास को छुपाया जा सकेगा?
याद रखिए जो समाज खुद में नहीं झांकता है, वो अंततः डूबता ही है। बिना समानता के कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। और जिसकी जड़ में ही असमानता कूट कूट कर भरी हो, वह आगे कैसे बढ़ेगा?
#Ramayana #RamayanaMovie #RamayanaReview #mythology
पैसा मिलता होगा?
भारत सरकार और Dear @fssaiindia से निवेदन है कि ऐसे लोगो को ढूँढ कर कार्रवाई करिए जो भारत के लोगो का शुद्ध खाने का अधिकार छीन रहे हैं …
ये कोई अकेली कहनी नहीं है, ऐसे कारखाने हजारों नहीं तो सैकडों तो मैने भी देख हैं, लेकिन उस जमाने मे लेबर ला नोटिफिकेशन तक कांग्रेस और लेफ्ट की सरकारे जारी नहीं करती थी, और लेफ्ट गैंग ने मालिक मजदूरों के शोषण मे भी कोई कमी नही छोडी,
एक जमाना था कानपुर को मैनचेस्टर बोला जाता था
लाल इमली जैसी फ़ैक्टरी के कपड़े प्रेस्टीज सिम्बल होते थे. वह सब कुछ था जो एक औद्योगिक शहर में होना चाहिए।
मिल का साइरन बजते ही हजारों मज़दूर साइकिल पर सवार टिफ़िन लेकर फ़ैक्टरी की ड्रेस में मिल जाते थे। बच्चे स्कूल जाते थे। पत्नियाँ घरेलू कार्य करतीं । और इन लाखों मज़दूरों के साथ ही लाखों सेल्समैन, मैनेजर, क्लर्क सबकी रोज़ी रोटी चल रही थी।
फ़िर "कम्युनिस्टो" की निगाहें कानपुर पर पड़ीं.. तभी से....बेड़ा गर्क हो गया।
"आठ घंटे मेहनत मज़दूर करे और गाड़ी से चले मालिक।"
ढेरों हिंसक घटनाएँ हुईं,
मिल मालिक तक को मारा पीटा भी गया। नारा दिया गया
"काम के घंटे चार करो, बेकारी को दूर करो"
अलाली किसे नहीं अच्छी लगती है. ढेरों मिडल क्लास भी कॉम्युनिस्ट समर्थक हो गया। "मज़दूरों को आराम मिलना चाहिए, ये उद्योग खून चूसते हैं।"
कानपुर में "कम्युनिस्ट सांसद" बनी सुभाषिनी अली । बस यही टारगेट था, कम्युनिस्ट को अपना सांसद बनाने के लिए यह सब पॉलिटिक्स कर ली थी ।
अंततः वह दिन आ ही गया जब कानपुर के मिल मज़दूरों को मेहनत करने से छुट्टी मिल गई। मिलों पर ताला डाल दिया गया।
मिल मालिक आज पहले से शानदार गाड़ियों में घूमते हैं (उन्होंने अहमदाबाद में कारख़ाने खोल दिए।) कानपुर की मिल बंद होकर भी ज़मीन के रूप में उन्हें (मिल मालिकों को) अरबों देगी। उनको फर्क नहीं पड़ा ..( क्योंकि मिल मालिकों कभी कम्युनिस्ट के झांसे में नही आए !)
कानपुर के वो 8 घंटे यूनिफॉर्म में काम करने वाला मज़दूर 12 घंटे रिक्शा चलाने पर विवश हुआ .. !! (जब खुद को समझ नही थी तो कम्युनिस्ट के झांसे में क्यों आ जाते हो ??)
स्कूल जाने वाले बच्चे कबाड़ बीनने लगे...
और वो मध्यम वर्ग जिसकी आँखों में मज़दूर को काम करता देख खून उतरता था, अधिसंख्य को जीवन में दुबारा कोई नौकरी ना मिली। एक बड़ी जनसंख्या ने अपना जीवन "बेरोज़गार" रहते हुए "डिप्रेशन" में काटा।
"कॉम्युनिस्ट अफ़ीम" बहुत "घातक" होती है, उन्हें ही सबसे पहले मारती है, जो इसके चक्कर में पड़ते हैं..!
कॉम्युनिज़म का बेसिक प्रिन्सिपल यह है :
"दो क्लास के बीच पहले अंतर दिखाना, फ़िर इस अंतर की वजह से झगड़ा करवाना और फ़िर दोनों ही क्लास को ख़त्म कर देना"
Ram Narayan retweeted
गरीबों की कोई डिग्निटी नहीं होती।
InFact कायदे की ज़िंदगी भी नहीं होती।
होती है धर्म जाति क्षेत्र की पहचान।
राजनेताओं की ग़ुलामी, उनसे जान पहचान।
उनके बेटे बेटियों को CM, PM बनाने की ज़िद।
उनके दल का टैग, हाथ में उनके झंडे का निशान।
Ram Narayan retweeted
भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी रैली होनी जा रही है
बसपा काडर अपने पिछले सब रिकॉर्ड तोड़ देगा
बसपा ही बसपा दिखाई दे रही है मिडिया में...,
मीडिया इस बार अभी से कह उठा है - बसपाई इस बार बाबासाहेब अंबेडकर को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिये 40-50 लाख ज्यादा पहुंच रहे।
#पूरा_उप्र_चलो_लखनऊ
बहुजन समाज पार्टी जिंदाबाद।
माननीय बहन जी जिंदाबाद।
भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी रैली होनी जा रही है
बसपा काडर अपने पिछले सब रिकॉर्ड तोड़ देगा
बसपा ही बसपा दिखाई दे रही है मिडिया में...,
मीडिया इस बार अभी से कह उठा है - बसपाई इस बार बाबासाहेब अंबेडकर को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिये 40-50 लाख ज्यादा पहुंच रहे।
#पूरा_उप्र_चलो_लखनऊ
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चिराग पासवान भी इतने अच्छे चुटकले सुनाते हैं, मुझे तो इसका अन्दाजा भी नही था। आज वाराणसी मे चिराग पासवान ने कहा है कि "मैं तो सर पे कफन बांध के निकल चुका हूं कि जब तक उत्तर प्रदेश को विकसित राज्य नहीं बना दूंगा तब तक मैं भी चैन की सांस नहीं लूंगा।"
भाई साहेब बिहार को तो विकसित करके आपने न्यूर्याक बना ही डाला हैं, अब यूपी को भी न्यूर्याक बनाकर ही दम लोगे क्या? भाई साहेब 403 सीटों पर चुनाव लड़ने को आए हैं, स्वागत करो इनका, इसके बाद इनको दूसरे राज्यों को भी विकसित करने जाना पड़ेगा। भले ही बिहार में सभी 243 विधानसभा सीटों पर लड़ने की सोचते तक नही है मोदी के हनुमान लेकिन यूपी मे उनको सभी सीटों पर ही लड़ना है।
@officeofchirag #highlights #everyone #followers #दिलबाग_सिंह
पासवान लालू मुलायम आदि को शर्म नहीं आती, इनके राज्यों के लोग विभिन्न राज्यों मे मजदूर बन कर शोषण सहन करने को मजबूर हैं, यूपी बिहार मध्यप्रदेश के मजबूर लाक डाऊन मे पीठ पर सामान, गोदी मे बच्चे लेकर हजारों किलोमीटर पैदल चल कर गए, बेशर्म नेताओं को लाज नहीं आती?
चिराग पासवान भी इतने अच्छे चुटकले सुनाते हैं, मुझे तो इसका अन्दाजा भी नही था। आज वाराणसी मे चिराग पासवान ने कहा है कि "मैं तो सर पे कफन बांध के निकल चुका हूं कि जब तक उत्तर प्रदेश को विकसित राज्य नहीं बना दूंगा तब तक मैं भी चैन की सांस नहीं लूंगा।"
भाई साहेब बिहार को तो विकसित करके आपने न्यूर्याक बना ही डाला हैं, अब यूपी को भी न्यूर्याक बनाकर ही दम लोगे क्या? भाई साहेब 403 सीटों पर चुनाव लड़ने को आए हैं, स्वागत करो इनका, इसके बाद इनको दूसरे राज्यों को भी विकसित करने जाना पड़ेगा। भले ही बिहार में सभी 243 विधानसभा सीटों पर लड़ने की सोचते तक नही है मोदी के हनुमान लेकिन यूपी मे उनको सभी सीटों पर ही लड़ना है।
@officeofchirag #highlights #everyone #followers #दिलबाग_सिंह
ऐसे शरारती तत्वों पर कारवाई होनी चाहिए।
Dear UC क्या ये व्यक्ति तुम्हारा IDOL है?
तावड़े की बहन का क्या कसूर जो उसको गाली दी जा रही है
क्या ये भाषा ठीक है???
@grok क्या ये tweet सत्य है
पढाई लिखाई मे पिछड जाना दुख दाई है, इसलिए बौखलाहट में हैं,
अपनी नाकामियों का ठीकरा आरक्षण पर फोड़ना बंद करो ज़ुल्फ़ों वाली बेगम
मेरिट के नाम पर ज्ञान बाँटने वालों की अपनी मेहनत और प्रदर्शन पर सवाल उठे तो तुरंत भावनात्मक ब्लैकमेल शुरू हो जाता है।
और देश के प्रधानमंत्री का नाम तक सम्मान से नहीं ले सकते, तो कम से कम अपनी राजनीतिक कुंठा को तर्क का नाम मत ही दो
मेरिट के नाम पर 0% आत्ममंथन, आरक्षण हटाने के नाम पर 100% भावनात्मक ब्लैकमेल
हद है, और गालिया देने के अलावा तुम कुछ कर भी नहीं सकते हो भारती
अबकी बार बसपा सरकार।
💙🐘 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: बहुजन समाज पार्टी ने भरी हुंकार! ✊
बसपा सुप्रीमो बहन कुमारी मायावती जी ने 2027 के यूपी संग्राम के लिए पूरी ताकत के साथ तैयारी शुरू कर दी है।
लखनऊ में हुई महाबैठक में सभी 75 जिलों के जिलाध्यक्षों एवं शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी में संगठन और चुनावी रणनीति पर मंथन हुआ।
🎯 लक्ष्य स्पष्ट है – उत्तर प्रदेश में पांचवीं बार BSP की पूर्ण बहुमत की सरकार!
बैठक में बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और मजबूत उम्मीदवारों के चयन पर जोर दिया गया।
📢 6 दिसंबर को लखनऊ में ऐतिहासिक महारैली का ऐलान!
साथ ही बहनजी ने चुनाव में पारदर्शिता के लिए EVM के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी दोहराई।
अब बसपा संगठन को मजबूत करने और 2027 की चुनावी तैयारी में पूरी ताकत से जुटने के संदेश के साथ आगे बढ़ रही है।
💙 बहुजन समाज पार्टी – सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय।
🐘 जय भीम! जय भारत! जय बसपा!
#Mayawati #BSP #UPElection2027 #बहुजन_समाज_पार्टी
Ram Narayan retweeted
माननीय बहन जी जिंदाबाद।
बसपा अध्यक्ष मायावती ने लखनऊ में पार्टी नेताओं की बैठक ली. मायावती की बैठक में आकाश आनंद ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया. इस बैठक में जहां मायावती ने नेताओं को विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारी करने के निर्देश दिए तो वहीं दूसरी तरफ बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग रखी. मायावती ने कंग्रेस पार्टी को घेरते हुए चुनावों में गड़बड़ी के कांग्रेस पर भी आरोप लगाए. मायावती ने ऐलान किया कि वे 6 दिसंबर को बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस की रैली में सम्मलित होंगी.
#mayawati #samajwadiparty #congress #BSP




















