यूपी एमएलसी चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए आने वाले संकट की आहट है।सच यही है कि सपा भारी पड़ी है।
एमएलसी चुनाव में सपा ने 2 सीटों पर बढ़त बनाकर यह संदेश दे दिया है कि 120 दिनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए केक वॉक नहीं होंगे।नतीजे बता रहे हैं कि पढ़े लिखे तबके ने भले ही भाजपा को नकारा नहीं हो,लेकिन सपा को स्वीकारा जरूर है।सपा ने भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्र वाराणसी, आगरा और प्रयागराज में बढ़त बनाकर भाजपा को अपनी रणनीति का ताना बाना फिर से बुनने के लिए मजबूर कर दिया है।बक़ौल केशव प्रसाद मौर्य
“सपा उन जगह पर जीत गई,जहां उन्हें नहीं जीतना था”।
दरअसल मोदी और योगी के नाम पर निर्भर बीजेपी ने ग़लत टिकट दे दिए और हार को ख़ुद आमंत्रित किया।
आगरा शिक्षक सीट से आकाश अग्रवाल ने पहले भाजपा से टिकट माँगा था,नहीं मिला तो आकाश अग्रवाल सपा में शामिल हो गए और जीत गए।
मोदी के वाराणसी स्नातक सीट पर सब कह रहे थे कि सपा के आशुतोष सिन्हा के सामने भाजपा के केदारनाथ सिंह टिक नहीं पाएंगे, वाराणसी शिक्षक सीट पर भी सपा के शिक्षक राजनीति के दिग्गज लाल बिहारी यादव के सामने भाजपा ने प्रमोद मिश्रा टिक नहीं पाएंगे,लेकिन बीजेपी को वाराणसी में मोदी के नाम पर भरोसा था,बीजेपी वाराणसी में दोनों हारी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सपा को पूर्वांचल के इसी बेल्ट सबसे अधिक सीटें मिली थीं।मतलब साफ़ है कि बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के बाद कोई सुधार नहीं किया।
सीएम योगी के घर गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर बीजेपी इसलिए बाल बाल बची क्योंकि यादव मतदाताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव को वोट दिया,सपा के संजयन त्रिपाठी को को नहीं।अगर अखिलेश यादव गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर अपने घोषित प्रत्याशी कमलेश यादव का टिकट काटकर संजयन त्रिपाठी को नहीं देते और संजयन त्रिपाठी को निर्दलीय खड़ा करवा देते तो बीजेपी सीएम योगी के घर गोरखपुर-फैजाबाद सीट भी हारती।
लखनऊ स्नातक सीट पर कुर्मी वोटर बीजेपी से बुरी तरह टूटा है।लखनऊ स्नातक सीट पर कुर्मी चेहरों की भिड़ंत में सपा की कांति सिंह बीजेपी के अवनीश सिंह पटेल पर भारी पड़ी।प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव ने ख़ुद पूरी ताक़त झोंक दी लेकिन कुर्मी समाज ने सपा की कांति सिंह का साथ दिया।कांति सिंह सपा के प्रतापगढ़ से सांसद शिवपाल सिंह पटेल की पत्नी हैं।कांति दूसरी बार एमएलसी बनी हैं। वह 2014 में सपा के टिकट पर लखनऊ स्नातक सीट से ही एमएलसी का चुनाव जीती थीं।2020 में भाजपा ने सपा से ये सीट छीन ली थी।
समाजवादी पार्टी इस बार एमएलसी चुनाव में पश्चिमी यूपी में बुरी तरह हारी है।पश्चिमी यूपी में कुल पांच सीटें थीं।इसमें सिर्फ आगरा की स्नातक सीट पर सपा ने कब्जा किया,जबकि बाकी चार सीटों पर भाजपा ने अपना कब्जा बरकरार रखा।
यह कहा जा सकता है कि सीटों के लिहाज से भाजपा बड़ी पार्टी बनी है लेकिन वोट शेयर में सपा ने बाजी मारी है।
चुनाव में कुल 14 लाख 81 हजार 310 वोटर थे।
भाजपा को कुल 2 लाख 61 हजार 379 वोट मिले हैं।
सपा को कुल 2 लाख 64 हजार 502 मत मिले।
सपा को भाजपा से 3,123 वोट (करीब 0.45%) ज्यादा मिले हैं।
सवर्णों की नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ी है।पिछड़ों ने भी बीजेपी से दूरी बनाकर रखी है।सवर्णों और पिछड़ों दोनों को साधने के चक्कर में दोनों बीजेपी से दूर हुए हैं।
मतलब दुविधा में दोनों गए,माया मिली ना राम।
उत्तर प्रदेश,बिहार,महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुल 28 सीटों पर हुए विधान परिषद चुनाव की तस्वीर लगभग साफ़ हो चुकी है।इन चार राज्यों में से तीन में बीजेपी और एक कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है।
कांग्रेस को उत्तर प्रदेश से कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए सपा को समर्थन देना कांग्रेस की मजबूरी थी।बिहार में ज़रूर आरजेडी से गठबंधन नहीं होने पर बिहार विधान परिषद की 8 सीटों में से कांग्रेस ने 5 सीटों पर अपने आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किए थे, लेकिन सभी सीटों पर कांग्रेस हार गई।
कांग्रेस के लिए सबसे बुरी खबर कर्नाटक से आई, जहां कांग्रेस सभी चारों सीटों पर हार गई।कर्नाटक में डीके शिवकुमार जैसे रणनीतिकार के सीएम रहते कांग्रेस से ऐसे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी।महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया।
महाराष्ट्र विधान परिषद की 5 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाविकास आघाड़ी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 3 स्नातक सीटों पर कब्ज़ा जमाया है, जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को सिर्फ़ 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा।
कांग्रेस ने संघ मुख्यालय,सीएम देवेंद्र फड़नवीस और नितिन गडकरी के गढ़ नागपुर में बीजेपी को चारों खाने चित कर दिया।नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने लगातार दूसरी बार ऐतिहासिक जीत दर्ज की है।
कांग्रेस ने जो तगड़ा झटका बीजेपी को नागपुर में दिया, वही तगड़ा झटका समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी में दिया।काशी में सपा के लाल बिहारी यादव ने 2020 में जहां महज 936 वोटों से जीत दर्ज की थी, वही इस बार भाजपा पर 5015 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की।काशी स्नातक सीट पर सपा प्रत्याशी आशुतोष सिन्हा भी जीत के दरवाजे पर खड़े हैं।
गोरखपुर में गोली योगी के कान को छूकर निकल गई,मतलब अपने घर में योगी हारते हारते बचे।गोरखपुर में भाजपा बेहद कड़े मुकाबले में सिर्फ 307 वोटों से जीत पाई।
सपा ने काशी में बीजेपी की चमड़ी उधेड़ दी है।गोरखपुर में अर्धनग्न अवस्था में बीजेपी को चौराहे पर खड़ा कर दिया है,और नागपुर में कांग्रेस ने बीजेपी की सरेराह इज्जत लूट ली।
कांग्रेस को इन चुनावों में खोने को कुछ नहीं था। कांग्रेस से कोई उम्मीद नहीं थी,निराश उन्होंने किया है जिनसे दुनियाभर की उम्मीद थी।
उत्तर प्रदेश चुनाव की पूर्व संध्या पर बीजेपी का यह प्रदर्शन बीजेपी के लिए चिंता लेकर आया है।कांग्रेस की हार पर हंसने वाले अंदर से बुरी तरह घायल हैं।
ख़ुद का घाव लाइलाज बने उसके पहले उसका इलाज कीजिए हुज़ूर।
Ramayan Special |
नई रामायण बनाना आसान है, लेकिन क्या रामानंद सागर वाली रामायण का जादू दोहराया जा सकता है?
वह कौन-सी बात थी, जिसने एक टीवी सीरियल को करोड़ों लोगों की आस्था और यादों का हिस्सा बना दिया?
रामानंद सागर के बेटे और फ़िल्ममेकर मोती सागर से सीधी बातचीत—उस रामायण के बनने की कहानी, उसकी अमिट छाप और सागर फ़िल्म्स के नए प्रोजेक्ट ‘श्रीमद् भागवतम’ तक का सफ़र।
देखिए यह ख़ास बातचीत।@MinakshiKandwal
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हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब नेताओं के साथ किसी संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति ने माना कि सत्ता और जवाबदेही एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते, इसलिए पद छोड़ना ही उचित है।
इसका सबसे चर्चित उदाहरण लाल बहादुर शास्त्री हैं।1956 में महबूबनगर रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्तीफे की पेशकश की थी,लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ऐसा न करने के लिए राजी कर लिया।लेकिन उसी वर्ष बाद में अरियालुर रेल दुर्घटना के बाद शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया।दुर्घटना के लिए वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं थे, फिर भी उनका मानना था कि मंत्रालय के प्रमुख होने के नाते इस विफलता की नैतिक जिम्मेदारी उन्हें ही लेनी चाहिए।उनका त्यागपत्र राजनीतिक शुचिता के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है।
किसी भी संस्था के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि उसके पद पर रहते उस संस्था का सम्मान बना रहना चाहिए।शीर्ष पर बैठा व्यक्ति अपने विभाग के कामकाज की जिम्मेदारी से स्वयं को अलग नहीं कर सकता है।किसी महत्वपूर्ण संस्था के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति संस्थागत विफलता के परिणामों से अनिश्चित काल तक स्वयं को अलग नहीं रख सकता।रखना भी नहीं चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पद जितना ऊंचा होता है, उसके साथ जुड़ी जवाबदेही भी उतनी ही अधिक होती है।संवैधानिक संस्थाओं को प्रश्नों से परे होना ही होगा।
यह देश किसी राजनीतिक दल के बदौलत नहीं है।देश का लोकतंत्र किसी राजनीतिक दल की खूंटी से बंधा नहीं है।यह देश किसी नेता के रहमो करम पर नहीं है। देश का लोकतंत्र संवैधानिक संस्थाओं के दम ख़म, उनकी नैतिकता और उनकी निष्पक्षता पर टिका है।
यह धारणा कि जब तक कोई अदालत, जांच एजेंसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की व्यक्तिगत जवाबदेही स्थापित न कर दे, तब तक उसे पद पर बने रहना चाहिए।ऐसा हर संस्था पर लागू नहीं होता है।
लोकतंत्र इससे कहीं अधिक की अपेक्षा करता है।यदि कोई व्यवस्था विफल हो जाए,या उसका कामकाज संदेह के घेरे में आ जाए तो उस संस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को स्वयं से भी पूछना चाहिए कि क्या उसके पद पर रहने से व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास मजबूत हुआ है या कमजोर?
सार्वजनिक पद जवाबदेही से बचने की ढाल नहीं होते; बल्कि जवाबदेही का अस्तित्व ही सार्वजनिक पदों के कारण है।
देश की जनता किसी भी संवैधानिक संस्था के शीर्ष पद पर काबिज व्यक्ति से उच्चतम नैतिकता का पालन करने की उम्मीद करती है।सर्वोच्च पद सर्वोच्च अहंकार का प्रतीक नहीं होता।
बिहार,उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुल 28 विधान परिषद सीटों पर हुए चुनाव के आज परिणाम घोषित होंगे।
सबसे ज्यादा 11 सीटें यूपी,बिहार में 8, महाराष्ट्र में 5 और कर्नाटक में 4 सीटों पर चुनाव हुए हैं।
यूपी की बात करें तो इस बार विधानसभा चुनाव से पहले माहौल बनाने के लिए सपा और बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।योगी की प्रतिष्ठा वाराणसी की शिक्षक और स्नातक और गोरखपुर-फैजाबाद सीट से जुड़ गई है।
2020 के चुनाव में वाराणसी की शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर सपा जीती थीं।पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र की सीटें हारने से भाजपा की बहुत किरकिरी हुई थी।गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर भाजपा से टिकट न मिलने पर डॉ. संजयन त्रिपाठी बागी हो गए और सपा के टिकट पर मैदान में है।इसके अलावा भाजपा के एक अन्य नेता अजय सिंह भी टिकट न मिलने से नाराज होकर निर्दलीय मैदान में उतर गए। रही-सही कसर इसी इलाके में स्नातक कोटे से भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने पूरी कर दी। पार्टी के एक कार्यक्रम में मंच पर न बैठाए जाने से नाराज होकर भाजपा के अपने प्रत्याशी ध्रुव त्रिपाठी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।इस वजह से गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन सीट पर मुकाबला 'अपनों की बगावत बनाम पार्टी कैडर' का बन गया।
गोरखपुर और वाराणसी केवल सीटें नहीं हैं, बल्कि यह सीएम योगी का 'किला' और पीएम मोदी का 'काशी मॉडल' है।इसी वजह से इन सीटों पर दोनों दलों के लिए यह चुनाव करो या मरो की लड़ाई बन गया।
दरअसल स्नातक वोटर को समाज का सबसे जागरूक और ओपिनियन मेकर वर्ग माना जाता है। 2027 के आम चुनाव से ठीक पहले इस वर्ग का वोटिंग पैटर्न यह दिखाएगा कि प्रदेश का यह तबका किस राजनीतिक धारा के साथ बह रहा है।
एमएलसी चुनाव के परिणाम 2027 की राजनीतिक दिशा और हवा का रुख कुछ हद तक बता देंगे।
बिहार की बात करे तो बिहार में एमएलसी की 8 सीटों में से जेडीयू का सिर्फ पटना स्नातक सीट पर कब्जा है।जेडीयू 4 सीटों पटना, तिरहुत स्नातक और सारण, दरभंगा शिक्षक सीट पर चुनाव लड़ी है।
इस चुनाव की कमान नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने संभाल रखी थी।निशांत कुमार के 8 मार्च को पार्टी में शामिल होने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव है। निशांत और संजय झा ने जमकर प्रचार किया। लल्लन सिंह प्रचार से दूर रहे।
अगर जेडीयू ने पिछली बार से अच्छा प्रदर्शन किया तो निशांत और संजय झा का पार्टी में प्रभाव बढ़ जाएगा।जेडीयू से बगावत करने वाले बाहुबली विधायक अनंत सिंह की ताक़त का भी पता चल जाएगा।जेडीयू ने अनंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया है।
प्रशांत किशोर की जनसुराज पहली बार विधान परिषद का चुनाव लड़ रही है।अगर इस चुनाव में प्रशांत किशोर जीत जाते हैं तो बांकीपुर के बाद यह दूसरी धमाकेदार जीत प्रशांत किशोर के जनसुराज की होगी।
महाराष्ट्र में तीन स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए चुनाव हुए हैं।ये निर्वाचन क्षेत्र हैं- पुणे संभाग स्नातक, नागपुर संभाग स्नातक, पुणे संभाग शिक्षक, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) स्नातक और अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र। महाराष्ट्र में बीजेपी- शिवसेना गठबंधन को कोई चुनौती नहीं है।
यूपी विधानसभा चुनाव में अमित शाह की बहुप्रतिक्षित एंट्री होने जा रही है।अमित शाह 30-31 अक्टूबर को लखनऊ आ रहे हैं।
2014 में मोदी के पीएम और अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद से लगभग सभी राज्य विधानसभा चुनाव में मोदी चेहरा और संगठन की कमान अमित शाह के हाथ में रही है।टिकट दिल्ली तय करता रहा है।
2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में योगी कहीं नहीं थे, 2022 के यूपी चुनाव में योगी थे, लेकिन कमान मोदी और शाह के हाथ में थी।लेकिन 10 साल के शासन के बाद योगी यूपी में पूरी खुली छूट चाहते है।टिकट वितरण में फ्री हैंड चाहते है। दिल्ली का नेतृत्व कितना योगी को खुला छोड़ता है और कितना बांध कर रखता है,यह अमित शाह के यूपी दौरे और आने वाले दिनों में तय होगा।
यूपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी योगी की पसंद नहीं है।सरकार में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य योगी की पसंद नहीं है, यूपी सरकार और संगठन में मोदी और शाह का दखल रहा है।अब टिकट बंटवारे में केंद्र का कितना और योगी का कितना दखल होगा यह आने वाला समय बताएगा।
योगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमित शाह से सामंजस्य बैठाने की होगी।अमित शाह भी जानते हैं कि योगी अब 2017 वाले योगी नहीं हैं।भले ही बीजेपी योगी को सीएम फेस घोषित ना करे,लेकिन चुनाव का चेहरा योगी ही होंगे।
योगी और शाह दोनों बीजेपी की बहुमूल्य खोज है। दोनों मिलकर एक और एक ग्यारह है।
भारतीय जनता पार्टी के सबसे मजबूत राज्य गुजरात में अलग ही लेवल का सत्ता संघर्ष चल रहा है।अपने अपने हथियारों को पैना किया जा रहा है।अपने अपने प्यादों को आगे कर शह और मात का खेल शुरू हो चुका है।यह सब सतह के नीचे और पर्दे के पीछे रहकर किया जा रहा है।
यह पूरा संघर्ष प्रदेश के दो नेताओं के बीच है।प्रदेश के दो नेताओं के सत्ता संघर्ष में प्रदेश की ब्यूरोकेसी भी दो खेमों में बट गई है।
पूरा गुजरात जब डांडिया में डूबा हुआ था,तब गुजरात के एक प्रभावशाली ब्यूरोक्रेट दिल्ली आते हैं।दिल्ली में गुजरात भवन में नहीं रुककर मोदी सरकार के एक कैबिनेट मंत्री के घर रुकते हैं।
गुजरात के प्रभावशाली यह अधिकारी मोदी सरकार के एक बेहद प्रभावशाली ब्यूरोक्रेट के घर जाकर गुजरात के एक बेहद बड़े मामले की पूरी ब्रीफिंग विस्तार से देते हैं और उसी दिन गुजरात लौट जाते हैं। गुजरात सरकार का यह विश्वस्तरीय प्रोजेक्ट अगले कुछ सालों में बनकर तैयार होगा।मामला इसी प्रोजेक्ट में बड़े खेल का है।गुजरात का एक बड़ा नेता इस बड़े खेल का बड़ा खिलाड़ी बनना चाहता है।इस खिलाड़ी का खेल ख़राब करने के लिए पूरी जानकारी दूसरे नेता ने अपने ब्यूरोक्रेट के माध्यम से दिल्ली भिजवा दी है।
गुजरात में ठीक एक साल बाद विधानसभा चुनाव होने हैं।एक दूसरे को निपटाने का खेल शुरू हो गया है। कोई चुनाव से पहले निपट सकता हैं और कोई चुनाव के बाद।निपटना तय है, बस कौन कब निपटता है यह देखना बाक़ी है।
अब गुजरात में एक म्यान में दो तलवारे नहीं रहेगी।
वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, काटने या संशोधन के लिए बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) को निर्वाचन आयोग की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। वहीं, बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) राजनीतिक दलों की सबसे अहम कड़ी हैं।बीएलए ही चुनाव के दौरान बूथ प्रबंधन से लेकर मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में अहम जिम्मेदारी निभाते हैं।माना जाता है कि जिस राजनीतिक दल का बूथ प्रबंधन सबसे बेहतर होता है, चुनावी नतीजे उसी दल के पक्ष में आते हैं।
लेकिन उत्तर प्रदेश के कुल 1,62,486 बूथों पर किसी भी राजनीतिक दल के शत प्रतिशत बीएलए नहीं है।
समाजवादी पार्टी से 125 सीट माँग रही कांग्रेस पार्टी के पास यूपी के 17 जिलों में बूथ पर कोई एजेंट (बीएलए) तक नहीं है।कांग्रेस ने 49,121 (30.23 फीसदी) बूथों पर बीएलए नियुक्त किए हैं।करीब 70 फीसदी बूथों पर कांग्रेस का एक भी बीएलए नहीं है।
सपा ने 1,62,486 बूथों में से 1,42,121 (87.46 प्रतिशत) बूथों पर बीएलए नियुक्त किए हैं लेकिन सपा के दिग्गज नेता और जेल में बंद पूर्व मंत्री आजम खां के रामपुर जिले में समाजवादी पार्टी का एक भी बीएलए नहीं है।
प्रदेश और देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल का दावा करने वाली भाजपा के भी यूपी में ढाई हजार बूथों पर चुनावी बस्ता उठाने वाला कोई नहीं है। यूपी में 1,62,486 बूथों में से भाजपा के 1,59,843 बूथों पर ही बूथ लेवल एजेंट हैं।जबकि 2,643 बूथों पर भाजपा का एक भी बीएलए नहीं है।यह स्थिति तब है जब यूपी में बीजेपी सरकार को दस साल पूरे होने जा रहे हैं और बीजेपी में संगठन को सर्वोपरि माना जाता है।
विधानसभा और विधान परिषद में एक भी विधायक नहीं होने बसपा ने 1,62,484 बूथों में से 1,38,681 (85.34 प्रतिशत) बूथों पर बीएलए नियुक्त किए हैं। लेकिन कानपुर नगर एक मात्र जिला है जहां बसपा का एक भी बीएलए नहीं है।
अपना दल (एस) की ओर से 1056, सीपीआई (एम) की ओर से 208 और आम आदमी पार्टी की ओर से 85 बूथों पर बीएलए नियुक्त किए गए हैं।
यूपी में एनडीए के सहयोगी एसआईआर में भाजपा के भरोसे ही नजर आ रहे हैं।एनडीए में शामिल राष्ट्रीय लोक दल, सुभासपा और निषाद पार्टी ने एसआईआर के लिए एक भी बीएलए नियुक्त नहीं किया है।यही स्थिति मैदान के बाहर से भाजपा का समर्थन करने वाले जनसत्ता दल लोकतांत्रिक की भी है।
विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की पार्टी पूर्वांचल और बुंदेलखंड में राजनीति करती है लेकिन उन्होंने एक भी बीएलए नियुक्त नहीं किया है।एनडीए में शामिल रालोद, सुभासपा, निषाद पार्टी भी विधानसभा और विधान परिषद में सदस्य हैं।लेकिन इनके भी बीएलए नहीं है।
यूरोप के देशों में हिंसक प्रदर्शनों में इस्लामिक संगठनों का हाथ माना जा रहा है।कई यूरोपीय देशों में इस्लाम को लेकर दहशत फैल रही है।यह भी सच है कि जर्मनी, फ्रांस,इटली और नीदरलैंड्स में इस्लाम विरोधी दलों का प्रभाव बढ़ा है।अमेरिका में भी मुस्लिम प्रवासियों और इस्लाम को लेकर आशंकाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुकी हैं।ट्रम्प तो सीधे इस्लामिक विचारधारा को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं।
50 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले यूरोप में मुस्लिम आबादी अभी करीब 6% है।इसलिए पूरे महाद्वीप पर किसी बड़े पैमाने के 'इस्लामी कब्जे' का दावा आंकड़ों से साबित नहीं होता, लेकिन संकट ज़रूर है।
इस्लाम और इस्लामवाद के बीच फर्क है।इस्लाम एक धर्म है, जबकि इस्लामवाद एक राजनीतिक विचारधारा है, जो धार्मिक सिद्धांतों को सार्वजनिक और राजनीतिक व्यवस्था में अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश करती है,और यही से संकट शुरू होता है।हर इस्लामवादी हिंसा का समर्थक नहीं होता, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर गैर-उदारवादी एजेंडा आगे बढ़ाने की कोशिश भी चिंता का विषय हो सकती है।
यूरोप की सुरक्षा एजेंसियां कुछ संगठित इस्लामवादी नेटवर्क को लेकर सतर्क हैं।फ्रांस में अधिकारी मुस्लिम ब्रदरहुड की घुसपैठ को लेकर चिंतित हैं।उत्तरी इंग्लैंड के ब्लैकबर्न में 12 काउंसिल वाडों में 60% से अधिक मुस्लिम हैं।दो वार्ड में 80% से अधिक हैं।ऐसे क्षेत्रों में महिलाएं दबाव महसूस कर सकती हैं कि वे शरिया परिषदों को अपने पारिवारिक जीवन को चलाने दें। स्थानीय स्तर पर स्कूल,मस्जिद,परिषद और चैरिटी जैसे संस्थानों में संगठित समूहों के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
इस्लामवादी खासकर गाजा के मुद्दे पर यहूदी-विरोधी भावना भड़काते हैं।वे अपनी मान्यताओं को लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की मांग करते हैं।राजनेताओं, शिक्षाविदों और पत्रकारों को स्वयं सेंसरशिप के लिए डराते हैं।ये बातें इन स्थानीय खतरों को बड़े खतरे में बदल देती है।
'मुस्लिम ब्रदरहुड' जैसे संगठन इस्लामिक नियमों को लागू करने पर जोर देते हैं।एक रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम ब्रदरहुड लोकतांत्रिक संस्थाओं में चुपचाप घुसपैठ की रणनीति व दोहरे रवैये से धर्मनिरपेक्ष नियमों के लिए खतरा पैदा कर रहा है।स्वीडन और जर्मनी की सरकारें भी राजनीतिक और कानूनी इस्लामवाद को अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय मानती हैं।
धार्मिक स्वतंत्रता,अभिव्यक्ति की आजादी और कानून के समान पालन के बीच संतुलन यूरोप की सबसे बड़ी कसौटी है।
फिलहाल पश्चिमी यूरोप के किसी भी देश में मुस्लिम आबादी कुल जनसंख्या के 10% से कम है।हालांकि फ्रांस (9.1%) और स्वीडन (8.1%) जैसे देशों में इनकी संख्या में तेजी से बढ़ी है।2015 के शरणार्थी संकट के बाद आए अधिकांश मुस्लिम तेजी से समाज में एकीकृत हो रहे हैं।
जर्मनी की एएफडी,नीदरलैंड की पीवीवी और फ्रांस के राष्ट्रवादी नेता मुस्लिमों को यूरोपीय सभ्यता के लिए खतरा बताते हैं।हिजाब या मस्जिदों पर कड़े प्रतिबंधों की मांग करते हैं।
यूरोप के उदार शरणार्थी नीति ने आज यूरोप को सबसे बड़े ख़तरे की ओर अग्रसर कर दिया है।
यूरोपीय देशों की इससे निपटने की रणनीति ही उनका भविष्य तय करेगी।
Politics in Punjab is heating with the prospects of a multi cornered fight. Who is ahead, who has fallen behind, who is fighting for relevance and what opportunities exist for a new political start up? @nistula speak to @vasudevavikas on all this and more-
youtu.be/TbhzZkwA75w?si… via @YouTube
Politics in Punjab is heating with the prospects of a multi cornered fight. Who is ahead, who has fallen behind, who is fighting for relevance and what opportunities exist for a new political start up? I speak to @vasudevavikas on all this and more-
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My brother purchased a Samsung Galaxy Z Fold 7 on 12 June 2026, and within just four months, the screen suddenly went black while he was using the phone.
Shockingly, both the Samsung service centre and customer care have refused to honour the warranty, citing a small scratch on the device and demanding payment for a screen replacement.
How can a minor scratch automatically justify rejecting a warranty claim for a screen that suddenly stopped working during normal use?
It is extremely disappointing that a premium flagship phone has developed such an issue within just four months of purchase, yet Samsung is refusing to provide warranty support. Customers pay a premium price for these devices with the expectation of quality, reliability, and dependable after-sales service—not unexpected repair expenses so soon after purchase.
We urge @SamsungIndia @Samsungmobile to intervene and arrange a fair resolution, including a free phone replacement.
Please take this matter seriously and escalate it to the appropriate team for an urgent resolution. @SamsungNewsIN
#Samsung #GalaxyZFold7 #WarrantyIssue #CustomerService
बीजेपी के नेता और फैजाबाद से पूर्व सांसद विनय कटियार ने बीजेपी और संघ के शीर्ष नेतृत्व को संदेश भेज कर अयोध्या से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा से अवगत करा दिया है।
खबर है कि विनय कटियार ने बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को भेजे संदेश में साफ़ कहा है कि वह सक्रिय राजनीति में वापसी करने का मन बना चुके हैं और अब यह पार्टी को तय करना है कि उन्हें 2027 में विधानसभा का टिकट देती हैं या 2029 में फैजाबाद लोकसभा सीट का।चुनाव वह ज़रूर लड़ेंगे।
अयोध्या राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख भूमिका निभाने वाले नेताओं में शामिल रहे विनय कटियार को उम्मीद थी कि पार्टी उनको अयोध्या राममंदिर निर्माण में या राम मंदिर ट्रस्ट में जगह देगी।बीजेपी ने दोनों मामलों से विनय कटियार को दूर रखा।विनय कटियार फिर से राज्यसभा की उम्मीद कर रहे थे, वह भी नहीं मिली। 2024 में फैजाबाद सीट बीजेपी के हारने पर विनय कटियार ने उम्मीदवार चयन पर सवाल उठाया था। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर चंपत राय पर प्रश्न खड़े किए थे।
विनय कटियार राम मंदिर आंदोलन के सबसे आक्रामक चेहरों में से एक थे।2002 से 2004 के दौरान यूपी बीजेपी के अध्यक्ष रहे। इसके बाद 2006 में बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी भी बने।एक बार भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे।1991, 1996 और 1999 में फैज़ाबाद सीट से तीन बार लोकसभा के लिए चुने गए। 2006 से 20218 तक दो बार राज्यसभा के सांसद रहे।2006 में रायबरेली से लोकसभा उपचुनाव भी लड़ा था,लेकिन सोनिया गांधी से हार गए थे।
पिछले कुछ समय से विनय कटियार ने बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों से दूरी बना ली थी, लेकिन अब फिर अयोध्या में डेरा डाल दिया है और जनसंपर्क शुरू कर दिया है।
विनय कटियार कुर्मी हैं और बीजेपी यूपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी भी कुर्मी हैं।
विनय कटियार चुनाव लड़ने की जिद कर रहे हैं और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चाहता है कि विनय कटियार अब आराम करे।संघ के वरिष्ठ नेता को विनय कटियार को समझाने की जिम्मेदारी दी गई है।
अभी अयोध्या विधानसभा सीट पर बीजेपी के वेद प्रकाश गुप्ता विधायक हैं,जिन्होंने 2017 में भी पार्टी के टिकट पर यह सीट जीती थी।
बीजेपी की बेरुखी से दूर विनय कटियार ने अयोध्या के अपने घर 'हिंदू धाम' में कार्यकर्ताओं से मिलना शुरू कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र प्रचारक अनिल सिंह इतनी चर्चा में क्यो हैं? छुटभैया नेता से लेकर तमाम बड़े नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के जुबान पर अनिल सिंह का नाम ही क्यो है?
उत्तर प्रदेश में यह चर्चा आम क्यो है कि अनिल सिंह को साध लो, सब सध जाएगा।सारा संगठन एक तरफ़ अनिल सिंह एक तरफ़।
मैं जब भी उत्तर प्रदेश के नेताओं और संघ के अपने संपर्कों से बात करता हूँ तो अनिल सिंह का नाम ज़रूर आता है।
संघ में संगठन सर्वोपरि होता है, एक व्यक्ति विशेष नहीं।संघ में प्रचारकों के दायित्व बदलते रहते हैं।संघ में प्रचारकों को जो जिम्मेदारी सौंपी जाती है, प्रचारक उसका निष्ठा के साथ निर्वहन करते हैं।
उत्तर प्रदेश संगठन और संघ की दृष्टि से एक प्रचारक की इतनी चर्चा और तरह तरह की चर्चा ठीक नहीं है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपनी एक पारंपरिक कार्य पद्धति है,जो बहुत ही अनुशासित,पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाली और सादगीपूर्ण होती है।
संघ के प्रचारकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ‘अनाम रहकर (बिना नाम और प्रचार के) समाज और संगठन को मजबूत करें।
संघ के पदाधिकारियों को समाज में अपनी छवि को लेकर सचेत और सतर्क रहना चाहिए।
संघ सर्वोपरि हैं, सत्ता नहीं।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्थापना दिवस है।
1925 में बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज 100 वर्ष पूरे कर रहा है।
आज से 100 साल पहले कौन कल्पना कर सकता था कि ऐसे ही छोटे-छोटे बालकों से शुरू हुआ संघ और संघ की शाखाओं से राष्ट्र का कुछ भला होने वाला है ? संघ के स्वयंसेवक जब संघ की शाखाओं में डंडा घुमाते थे तो लोग हँसते थे और कहते थे कि क्यों हवा में डंडा घुमा रहे हो ? संघ का यह डंडा कुत्ता मारने के भी काम नहीं आएगा। ये क्या राष्ट्र की रक्षा करेंगे।
आज 100 साल पूरे कर चुका संघ सब प्रश्नों का जवाब है।संघ के 100 साल की यात्रा संघ के स्वयंसेवक के भावबल और जीवनबल पर संभव हो सकी।संघ में मानसिकता से हर स्वयंसेवक प्रचारक ही हो जाता है।संघ की यही जीवन-पद्धति है।
संघ स्वयंसेवकों का जीवन और उसका भावबल है और उसी भावबल से संघ आगे बढ़ रहा है।
संघ तीन प्रतिबंधों और तमाम साजिशों,अवरोधों और विरोध के बाद भी आज हर गाँव और हर वर्ग तक पहुँचा है।
दुनिया संघ को विविधता में देखती है,लेकिन संघ के लिए यह विविधता एकता की सजावट है।संघ को हर विविधता तक पहुँचना है और समाज को एक सूत्र में जोड़ना है।
संघ की 100 साल की ऐतिहासिक यात्रा को मैंने संघ पर लिखी अपनी किताब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ “अहं से वयं”की यात्रा में समेटने की कोशिश की है।
अमेज़न की लिंक आपसे साझा कर रहा हूँ।
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इधर राहुल गांधी विपक्ष के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर धरना प्रदर्शन कर रहे थे,उधर अमित शाह और बीजेपी के रणनीतिकार संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहे थे।
दरअसल विपक्षी एकता का नेतृत्व कर रही कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लोकसभा सीटें बढ़ाने के लिए संविधान (131वां संशोधन) बिल,परिसीमन (संशोधन) बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल पर लगने जा रहा है।
गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हुआ था,लेकिन इसका अब तक सत्रावसान नहीं किया गया है।
क्या है लोकसभा का गणित
लोकसभा में 543 सांसद हैं।3 सीटें खाली हैं। इनमें से एनडीए के 318 सांसद हैं। बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई यानी 360 वोट चाहिए। मतलब सरकार को 42 सांसदो का समर्थन चाहिए।
राज्यसभा का क्या है गणित
राज्यसभा में 245 सीटें हैं। 3 खाली हैं। इस तरह 240 में से एनडीए के 153 सांसद हैं।यहां बिल को पास कराने के लिए 162 सांसद चाहिए।यानी,यहां भी एनडीए को छोटी पार्टियों के 9 सांसदों की जरूरत पड़ेगी।
कौन सरकार का साथ दे सकता है।
लोकसभा में ऐसे 39 सांसद हैं जो ना एनडीए का हिस्सा हैं और ना ही इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं।इसमें से डीएमके के 22, अकाली दल के एक और निर्दलीय और अन्य छोटे दलों के 4 सांसद सरकार का समर्थन कर सकते हैं।नागौर से लोकसभा सांसद हनुमान बेनीवाल का सरकार के साथ जाना तय है।
इंडिया गठबंधन में से सबसे दिलचस्प समर्थन नेशनल कॉन्फ़्रेंस के 2, झारखंड मुक्ति मोर्चा के 3 के साथ शरद पवार के 8 सांसदो का समर्थन मिल सकता है।
खबर यह भी है कि समाजवादी पार्टी से बातचीत लगभग हो चुकी है।अखिलेश यादव ने थोड़ा समय मांगा है।अखिलेश यादव भी अंतिम समय में सरकार का समर्थन कर सकते हैं।
एक क्षेत्रीय पार्टी में बड़ी टूट भी हो सकती है।कांग्रेस के कुछ सांसद भी पाला बदल सकते हैं,भले ही उन्हें फिर चुनाव में जाना पड़े।
दरअसल मोदी और शाह कांग्रेस को बड़े झटके के साथ बिल पास कराना चाहते हैं।झटका कब और कितने वोल्ट का होगा यह देखना बाकी है।
थोड़ा इंतिज़ार कीजिए।सरकार संसद में बिल पास कराने जा रही है।
रोज़ सुबह लिखने का सिलसिला 1277 दिनों से लगातार जारी है।लिखने से एक दिन का भी अवकाश नही लिया।
सुबह लिखने के इस उपक्रम में कुछ अच्छा पढ़ने और मनपसंद सुनने के लिए समय नहीं मिल रहा था। सोशल मीडिया समय का एक अच्छा खासा हिस्सा सोख रहा है।इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सोशल मीडिया के इश्क़ ने मुझे निकम्मा बना दिया।मेरी पूरी दुनिया सोशल मीडिया पर लिखने और टीवी डिबेट में सिमट कर रह गई।सोशल मीडिया से दूरी बनाकर ख़ुद के लिए थोड़ा समय चाहता हूँ।
एक सप्ताह सोशल मीडिया से दूर रहने का तय किया है।फैसला आसान नहीं था,लेकिन कर लिया है।
अब आप सबसे अगले सोमवार 19 अक्टूबर को सुबह 8.30 बजे मुलाक़ात होगी।
आप सब स्वस्थ रहे, मस्त रहे और अपना ध्यान रखें।
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दिल्ली पुलिस इतनी नाकारा और निकम्मी है कि पत्रकारों को भी आंदोलनकारी समझ रही है। देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों,नए युवा पत्रकारों, मीडिया संस्थाओं को एक ही डंडे से हॉक रही है।
आज सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है। बच्चन साहब आज 84 साल के हो गए।
इस उम्र में भी अमिताभ बच्चन रचनात्मक ऊर्जा से खौल रहे है और हमारी खाली जगहों को ऐसे भर रहे है जैसा उँगली पर गिनने वाले लोग कर पाते हैं।
अपने शुरुआती सालों में लंबे और बहुत दुबले-पतले अमिताभ के पास न क्लासिक सुडौल चेहरा था और न ही सुगठित मांसपेशियों से भरी वैसी काया जो उनके समकालीन अभिनेताओं के पास थी।मगर अभिताभ के पास जो था वह किसी और के पास नहीं था।सिनेमा और इतिहास ने अमिताभ बच्चन को जो भूमिका सौंपी,उसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया।जब अमिताभ सोच-विचार में खोई, सुलगती आंखें और सदमे के साथ गुस्सा और तकलीफ बयान करने वाला चेहरा लेकर आए तो लोगों के दिलो-दिमाग में उसकी गहरी गूंज सुनाई दी।उन्होंने जीने और होने का एक तरीका बताया।
अमिताभ बच्चन के आगाज का एक असल लम्हा खोजना हो तो वह हो सकता है जब दर्जन भर असफल फिल्मों के बाद भी सलीम-जावेद की सिफारिश पर प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को 'जंजीर' फ़िल्म में अवसर दिया और जंजीर में परदे की उनकी हीरोइन और बाद में पत्नी बनीं जया भादुड़ी ने गूंजते हुए शब्दों में उनसे कहा, "इस लावे को बहने दो." और वह बह निकला, दशकों के लिए,जहां अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा का नंबर 1 से नंबर 10 तक कहा जाने लगा।
एक समय ऐसा भी आया जब बेहिसाब कर्ज और लगभग दिवालिया हो चुके अमिताभ को धीरूभाई अंबानी ने सलाह दी कि अभिनय के रास्ते पर चलकर ही वह कर्ज से मुक्ति पाएंगे क्योंकि इसी काम में वह निपुण हैं और इसी के बाद उन्होंने कौन बनेगा करोड़पति के साथ साधारण लोगों से मनोहर मुस्कान के साथ सौम्य बातचीत करते हुए खुद को नए सिरे से ईजाद किया।यश चोपड़ा की 'मोहब्बतें' अनुबंधित की।यहीं से कर्ज मुक्ति की राह प्रशस्त हुई।कर्ज से उबरने के लिए अपने दृष्टिकोण को विशुद्ध व्यावसायिक बना लिया और उसके बाद अमिताभ बच्चन ने स्वयं को कभी भी किफायत से खर्च नहीं किया। मेहनताना मिल जाने पर उन्हें फिल्म की गुणवत्ता से कोई सरोकार नहीं किया।पैसा फेंको, तमाशा देखो उनका मूल मंत्र बन गया।उन्होंने अभूतपूर्व वापसी का ताना-बाना बुना।ऐसी वापसी जिससे वे फिर कभी लौटकर नहीं गए।अमिताभ बच्चन ने सभी बाधाओं को साहस के साथ पार किया।उनका जुझारूपन हर दौर में काम आया।कड़ा परिश्रम और अनुशासन उनके व्यक्तित्व के सार तत्व है।
अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन ने बालक अमिताभ को जब नैनीताल के प्रख्यात शेरवुड स्कूल में भेज था, तब धनवान पुत्रों के साथ अमिताभ का परिचय हुआ।अपने स्कूल के दोस्तों की जीवन-शैली को देखकर अमिताभ ने बचपन में ही निश्चय किया था कि जीवन में बहुत सफल और अमीर आदमी बनना है।पैसा कमाने का यह बीज अमिताभ में नैनीताल के शेरवुड स्कूल में पड़ा।धन कमाने की इस ललक का निर्वाह वह आज भी कर रहे हैं।
आज अमिताभ बच्चन के लिए यादों की जुगाली के साथ आत्मावलोकन का भी अवसर है और वह स्वयं ही सोच सकते हैं कि उन्होंने क्या खोया और क्या पाया, या बतर्ज अपने पिता की आत्मकथा के पहले भाग की तरह 'क्या भूलूं, क्या याद करूं'।
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ बच्चन साहब।
#shameonyou. Delhi police
दिल्ली पुलिस आपको शर्म आनी चाहिए।


