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“Advocate | Lucknow High Court | Helping people with Legal Solutions & UP Politics Analysis | Justice, Reform & Truth | DM for Consultations”

High Court ( Lucknow )
Joined January 2016
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#मॉडल_पोलिस_ऐक्ट_2006 से क्यों डरती है देश की सरकार ? #1861__अंग्रेज़ी_पोलिस_क़ानून देश के लिए एक अभिशाप ? नही इच्छाशक्ति ,न कोई सरोकार बस जुमलेबाज सरकार और कमजोर समाज 😡 #मॉडल_पोलिस_ऐक्ट_2006 लागू करें .@PMOIndia @HMOIndia @narendramodi @AmitShah
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अनंत सिंह हर हाल में बेटी के शादी के बाद सरेंडर करना ही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा 67 आपराधिक मामला दर्ज है हाई कोर्ट ने बिल कैसे दे दिया.? 1 दिसंबर तक हर हालत में अनंत सिंह को सरेंडर करना है। सरकार अनंत सिंह मामले में न्यूट्रल रहा।
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"वो (स्वामी प्रसाद मौर्य) हमारे गंठबंधन में नहीं शामिल होंगे। हमारी सीटों की गिनती में नहीं शामिल हो सकते" अखिलेश यादव ने कांग्रेस पार्टी को डायरेक्ट संदेश दे दिया है कि स्वामी प्रसाद को गंठबंधन में नहीं लेना है। स्वामी प्रसाद पिछले दिनों राहुल गांधी से मिले थे और उसके बाद अखिलेश यादव की काफी आलोचना की थी। जवाब देते वक्त अखिलेश यादव का चेहरा और भाषा काफी सख्त देखी गई. @SwamiPMaurya @yadavakhilesh @INCIndia @samajwadiparty
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अकेले अकेले CM बनेंगे ! वैसे इस समय अखिलेश के ऊपर ब्राह्मणों साया चढ़ गया है 🤡 पूरी तरह से इनपर कंट्रोल बना चुके हैं ! वोट भी दे रहे हैं ? आगे कितना वोट देंगे भगवान जाने । जो वो लोग कहेंगे वही करेंगे अखिलेश यादव 🖐️
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इस वक्तव्य को अगर महाराष्ट्र स्वीकार करता है तो धन्य है मराठा अस्मिता और स्वराज्य की परिकल्पना ?
नेता जी, सत्ता की मलाई खाकर अक्ल पर ताला पड़ गया है क्या? बुलढाणा की प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिंदे गुट के विधायक संजय गायकवाड़ का शर्मनाक बयान सुनिए.... इन्होंने कहा कि "आत्महत्या करने वाले किसान के अंतिम संस्कार में कोई शामिल न हो, शव को जानवर खाएंगे तभी किसान आत्महत्या बंद करेंगे।" अरे बेशर्मों! फसल बर्बादी, कर्ज़ और तुम्हारी नाकामी जब किसान की जान लेती है, तब संवेदना दिखाने के बजाय लाशों को जानवरों से कटवाने की बात करते हो? अन्नदाता का ऐसा अपमान करने वालों को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है! 😡
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ओवैसी साहब योगी जी को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं खुद सुनिए ओवैसी साहब की जुबानी। अब समझ में आया ओवैसी साहब सिर्फ मुसलमानो का इस्तेमाल कर रहे हैं भाजपा और अपने फायदे के लिए बाकी कुछ नहीं। वीडियो देखिए और खूब इंजॉय करिए 😂
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क्या आज बीजेपी के किसी आधिकारिक या बड़े हैंडल ने कारसेवकों को श्रद्धांजलि दी ? क्या कारसेवकों के नाम पर राजनीतिक सुख भोगने वाले आज अयोध्या में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित नहीं कर सकते थे ? क्या किसी कारसेवक के परिवार को आज तक राष्ट्रीय सम्मान दिया गया ? कारसेवकों का लगातार अपमान करती बीजेपी !
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जब तक मंदिर आंदोलन चल रहा था, तब तक कारसेवकों का नाम लेकर भावुक राजनीति चमकाई गई। आज जब भव्य राम मंदिर बन चुका है और सत्ता की मलाई हाथ में है, तो 30 अक्टूबर 1990 को सरयू तट पर अपनी जान गंवाने वाले रामभक्तों को नमन करने की फुर्सत भी किसी बड़े नेता को नहीं है। यह खामोशी साबित करती है कि राजनीति के लिए सिर्फ जिंदा वोट और मृत मुद्दे मायने रखते हैं। #RamMandir #PoliticalHypocrisy
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कागजों पर मृत संजीवनी भी बांट रहे हैं लेकिन सत्य केवल मृत्यु है !
गोरखपुर AIIMS की डायरेक्टर की अचानक तबीयत खराब हुई अस्पताल में सुविधा ना होने पर उन्हें प्राइवेट हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया ये कैसा AIIMS है, जहाँ सुविधाएं नहीं हैं !
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UCC का आइडिया संविधान के आर्टिकल 44 से आया है, जिसमें कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड बनाने की कोशिश करेगा। लेकिन, आर्टिकल 44 डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पॉलिसी का हिस्सा है। आर्टिकल 37 के तहत, ये प्रिंसिपल्स कोर्ट द्वारा लागू नहीं किए जा सकते। आसान शब्दों में, आर्टिकल 44 खुद UCC नहीं बनाता है। इसे लागू करने के लिए लेजिस्लेचर को कानून पास करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोराईराजन (1951) में कहा था, जहाँ DPSP किसी फंडामेंटल राइट से टकराता है,वहाँ फंडामेंटल राइट ही मान्य होना चाहिए! इसलिए आर्टिकल 44 के मकसद को आगे बढ़ाने वाला राज्य UCC, पार्ट III को ओवरराइड नहीं कर सकता। राज्यों के पास कई ऐसे विषयों पर कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार है जो UCC का हिस्सा बनेंगे। जैसा कि सिंह ने कहा, इसलिए एक राज्य UCC को अलग-अलग तौर पर इंटेलिजिबल डिफरेंसिया और रैशनल नेक्सस, और ज़ाहिर मनमानी के स्टैंडर्ड के दोहरे टेस्ट को पूरा करना होगा। कंकरेंट लिस्ट की एंट्री 5 में शादी और तलाक, गोद लेना, वसीयत, बिना वसीयत के रहना और उत्तराधिकार, जॉइंट फैमिली और बंटवारा, और पर्सनल लॉ से जुड़े मामले शामिल हैं। क्योंकि ये सब्जेक्ट कंकरेंट लिस्ट में हैं, इसलिए पार्लियामेंट और स्टेट लेजिस्लेचर दोनों इन पर कानून बना सकते हैं। आर्टिकल 254 भी सामने आता है। अगर कोई राज्य का कानून किसी मौजूदा सेंट्रल कानून से कॉन्करेंट लिस्ट के सब्जेक्ट पर टकराता है, तो सेंट्रल कानून आम तौर पर लागू होता है। कुछ खास हालात में, कोई राज्य का कानून उस राज्य में लागू हो सकता है अगर उसे प्रेसिडेंट के विचार के लिए रिज़र्व किया गया हो और प्रेसिडेंट की मंज़ूरी मिल जाए। पार्लियामेंट बाद में ऐसे राज्य के कानून को ओवरराइड कर सकती है। संविधान सिर्फ़ पार्लियामेंट को ही पर्सनल-लॉ के विषयों पर कानून बनाने वाली इकलौती लेजिस्लेचर नहीं बनाता है। कॉन्करेंट लिस्ट की एंट्री 5 पार्लियामेंट और राज्यों दोनों को इनमें से कई एरिया में लेजिस्लेटिव अधिकार देती है ! अलग-अलग ऑर्डर और बार-बार होने वाले केस को कम करने का एक तरीका यह हो सकता है कि एक सेंट्रल डिजिटल रजिस्ट्री और एक इंटर-स्टेट डिस्प्यूट-रिज़ॉल्यूशन सिस्टम बनाया जाए। उत्तराखंड जनवरी 2025 में UCC अपनाने वाला पहला भारतीय राज्य बन गया। इसके कानून में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और विरासत शामिल हैं। यह एक से ज़्यादा शादी पर भी रोक लगाता है और शादियों और लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन का भी प्रावधान करता है। गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने तब से अपने UCC कानून पास कर दिए हैं। उनके कानून कई एक जैसे एरिया को कवर करते हैं, लेकिन प्रोविज़न एक जैसे नहीं हैं। उदाहरण के लिए, असम में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रोविज़न हैं, जबकि मध्य प्रदेश का कानून गोद लेने और मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े कुछ तरीकों जैसे एरिया को भी देखता है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। अगर एक राज्य में लिव-इन रिलेशनशिप के लिए एक तरह के नियम हैं और दूसरे राज्य में अलग तरह के, या अगर उनके उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग हैं, तो भारत में एक ही कानून के कई वर्जन हो सकते हैं, जिनसे ऐसे मामलों में एक जैसा नियम आएगा। UCC का सबसे बड़ा असर परिवार और प्रॉपर्टी के मामलों से जुड़े पर्सनल लॉ पर पड़ेगा। हिंदू पर्सनल लॉ अब ज़्यादातर हिंदू मैरिज एक्ट, 1955, हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956, हिंदू एडॉप्शन्स एंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956, और हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 जैसे कानूनों से चलता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ, कानून और पर्सनल-लॉ नियमों के कॉम्बिनेशन से चलता है। ज़रूरी कानूनों में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937, डिसॉल्यूशन ऑफ़ मुस्लिम मैरिजेज़ एक्ट, 1939, और तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानून जैसे तुरंत तीन तलाक़ और निकाह हलाला शामिल हैं। ईसाइयों और पारसियों के लिए भी परिवार और उत्तराधिकार के मामलों से जुड़े खास कानूनी नियम हैं! इसलिए UCC का मतलब सिर्फ़ यह नहीं होगा कि ये सभी कानून खत्म हो जाएंगे। इसका असली असर उस खास राज्य के कानून के शब्दों और उसमें शामिल विषयों पर निर्भर करेगा। उदाहरण के लिए, अगर UCC उत्तराधिकार का एक कॉमन कानून बनाता है, तो उसे यह बताना होगा कि वह कानून मौजूदा उत्तराधिकार कानूनों के साथ कैसे इंटरैक्ट करता है। यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि मौजूदा पर्सनल-लॉ कानूनों में पहले से ही ऐसे अधिकार हैं जिन्हें कोर्ट ने मज़बूत किया है। हैं।
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विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के तहत बेटियों को जन्म से बेटों के समान सहदायिक अधिकार प्राप्त है ! एक नए कॉमन सक्सेशन कानून को UCC के अलग नेचर की वजह से होने वाले कन्फ्यूजन को दूर करना होगा। अनुच्छेद 44 बनाम अनुच्छेद 25 जब आर्टिकल 44 को आर्टिकल 25 के साथ पढ़ा जाता है, तो संवैधानिक बहस और मुश्किल हो जाती है। आर्टिकल 25, संवैधानिक सीमाओं के तहत, अंतरात्मा की आज़ादी और धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने के अधिकार की रक्षा करता है। मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि कोई समुदाय किसी खास नियम को अपने पर्सनल लॉ का हिस्सा मानता है या नहीं। कोर्ट ने यह भी देखा है कि कोई प्रैक्टिस धार्मिक है या धर्म से जुड़ी कोई सेक्युलर एक्टिविटी है। जॉन वल्लमट्टम बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (2003) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराधिकार जैसे मामलों के सेक्युलर स्वरूप पर विचार किया था। संवैधानिक लड़ाई अक्सर कैरेक्टराइज़ेशन पर निर्भर करेगी। सरकार यह तर्क देगी कि शादी, तलाक और उत्तराधिकार सेक्युलर सिविल नतीजे हैं; चुनौती देने वाला यह तर्क दे सकता है कि कोई खास नियम धार्मिक रीति-रिवाजों को शामिल करता है या उन पर काफी हद तक असर डालता है। इसलिए आर्टिकल 25 को सिविल-लॉ रिफॉर्म पर पूरी तरह से वीटो या जांच से ऑटोमैटिक छूट नहीं माना जा सकता ! UCC को दूसरे फंडामेंटल राइट्स, खासकर संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 को पूरा करना होगा। इसका मतलब है कि सिर्फ़ एक जैसा होना किसी कानून को संवैधानिक रूप से वैध नहीं बनाता। UCC से बनाए गए असल नियमों को अभी भी मौलिक अधिकारों के खिलाफ़ परखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में पर्सनल-लॉ सुधार पर चर्चा की है, लेकिन उसने खुद कभी UCC नहीं बनाया। सरला मुद्गल बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (1995) मामले में, कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और शादी के संदर्भ में आर्टिकल 44 पर चर्चा की थी। पन्नालाल बंसीलाल पिट्टी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1996) मामले में, कोर्ट ने अलग-अलग तरह के समाज में एक जैसे फैमिली कानून लाने में आने वाली मुश्किलों को माना और कहा कि सुधार धीरे-धीरे हो सकता है। कोर्ट ने व्यक्तिगत पर्सनल-लॉ प्रैक्टिस पर भी विचार किया है। शाह बानो (1985) मामले में, इसने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन 125 के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला के मेंटेनेंस के अधिकार की जांच की। डेनियल लतीफी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (2001) में, इसने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) एक्ट, 1986 का इस तरह से मतलब निकाला कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के सही और वाजिब प्रावधान के अधिकार की रक्षा की गई। शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (2017) मामले में, कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक़ की वैलिडिटी पर विचार किया। उत्तराखंड UCC लिव-इन रिलेशनशिप को रेगुलेट करके पारंपरिक पर्सनल लॉ से आगे की बहस को भी आगे ले जाता है। ये मामले दिखाते हैं कि पर्सनल लॉ पहले से ही कानून और अदालती फैसलों के मेल से बदल रहा है। आगे बढ़ने का रास्ता भारत ने पहले ही धार्मिक पहचान से हटकर कुछ आम कानून लागू कर दिए हैं। गोद लेना, घरेलू हिंसा, बाल विवाह, और कई मेंटेनेंस उपाय ऐसे एरिया के उदाहरण हैं जहाँ धर्म की परवाह किए बिना सेक्युलर कानून लागू होते हैं। इसलिए UCC पूरी तरह से खाली स्लेट से शुरू नहीं होगा। बड़ा सवाल यह है कि यह प्रोसेस कितना आगे तक जाएगा और अलग-अलग राज्यों के कानून आखिर में एक साथ कैसे फिट होंगे।
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राजनीतिक प्रवक्ताओं से बेइज्जत वही ऐंकर होते हैं जिनके गेस्ट कॉर्डिनेटर oblized होते हैं 😜 या जिनके चैनल में सत्ता के लोग बोर्ड का हिस्सा होते हैं !
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बाकी सरकारी संस्थाओं के मुख्यालयों के आसपास ?
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😜😜😜🤣🤣🤣😜😜😜
अखिलेश जी: तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा..किसने कहा था पत्रकार: स्वामी विवेकानंद ने अखिलेश जी: आप लोग वनस्पति लेकर आए है क्या ? पत्रकार: योगी जी ने तो यही बताया है अखिलेश जी 🤣🤣🤣🤣🤣🤣🫡🙏🏻
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Adv Viivek kumar Pandey retweeted
अखिलेश यादव ने मुझे इतना दिया जिसकी मैने कल्पना नहीं की थी अब मुझे कुछ नहीं चाहिए अब मैं आजीवन एक कार्यकर्ता बनकर पार्टी की सेवा करूंगा। संजयन त्रिपाठी गोरखपुर फैजाबाद📍
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लखनऊ- अखिलेश यादव ने 27 हजार शराब की दुकानें खुलवाने और 26 हजार स्कूल बंद करने का आरोप लगाया। काशी के मणिकर्णिका घाट का जिक्र करते हुए बोले, इसे जनता कैसे भूल सकती है।
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